दुनिया में महंगाई का दबाव अगले साल भी रहेगा बरकरार! रॉयटर्स के सर्वे में 50 में से 31 अर्थव्यवस्थाओं के अनुमान बढ़े, भारत पर भी असर
- bySanjay
- 27 October, 2026
दुनिया में महंगाई का दबाव अगले साल भी रहेगा बरकरार! रॉयटर्स सर्वे में 31 अर्थव्यवस्थाओं के अनुमान बढ़े
27 अक्टूबर 2026 | विश्व अर्थव्यवस्था

दुनिया की अर्थव्यवस्था के सामने महंगाई एक बार फिर बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है। ऊर्जा की बढ़ती कीमतों, मध्य पूर्व में जारी संघर्ष और उत्पादन एवं परिवहन लागत पर पड़ रहे दबाव के कारण अर्थशास्त्रियों को आशंका है कि महंगाई 2027 में भी अपेक्षा से अधिक बनी रह सकती है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के 27 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित सर्वेक्षण में शामिल 500 से अधिक अर्थशास्त्रियों ने कई देशों के लिए अगले साल के महंगाई अनुमान बढ़ाए हैं। सर्वेक्षण के अनुसार, 50 अर्थव्यवस्थाओं में से 31 के लिए 2027 के महंगाई अनुमान पहले की तुलना में ऊपर किए गए हैं। इससे संकेत मिलता है कि कीमतों को लेकर चिंता केवल कुछ देशों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में भी इसका असर दिखाई दे रहा है।
रॉयटर्स के सर्वे में क्या सामने आया?
रॉयटर्स ने दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों से आर्थिक विकास, महंगाई और भविष्य की संभावनाओं पर अनुमान जुटाए। अक्टूबर में हुए इस सर्वेक्षण में 2027 के महंगाई अनुमान 50 में से 31 अर्थव्यवस्थाओं के लिए बढ़ाए गए। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में भी यही रुझान दिखाई दिया। सर्वे में शामिल 21 विकसित अर्थव्यवस्थाओं में से 15 के लिए अगले साल महंगाई का अनुमान बढ़ाया गया।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कई केंद्रीय बैंक पिछले वर्षों में ब्याज दरों में बदलाव करके महंगाई को नियंत्रित करने की कोशिश कर चुके हैं। अब ऊर्जा की कीमतों और व्यापक आर्थिक परिस्थितियों के कारण महंगाई में दोबारा तेजी आने की आशंका उनकी नीतियों को और जटिल बना सकती है।
हालांकि, सर्वेक्षण यह नहीं कहता कि हर देश में महंगाई समान दर से बढ़ेगी। अलग-अलग देशों की ऊर्जा जरूरतें, मुद्रा की स्थिति, सरकारी नीतियां, घरेलू मांग और आयात पर निर्भरता अलग होती है। इसलिए महंगाई का वास्तविक असर भी देश-दर-देश अलग हो सकता है।
कच्चे तेल की कीमतें क्यों बनी हुई हैं बड़ी चिंता?
रिपोर्ट में महंगाई के प्रमुख कारणों में ऊर्जा की ऊंची कीमतों और मध्य पूर्व के संघर्ष से पैदा हुई अनिश्चितता को शामिल किया गया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, 7 अक्टूबर से कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई थीं और पिछले सप्ताह कीमतें छह महीने के उच्च स्तर को पार करते हुए 117 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर पहुंच गई थीं।
तेल महंगा होने का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। परिवहन, माल ढुलाई, कृषि, औद्योगिक उत्पादन और कई अन्य सेवाओं की लागत भी बढ़ सकती है। कंपनियों को जब कच्चा माल और सामान पहुंचाने में ज्यादा खर्च करना पड़ता है, तो वे उस अतिरिक्त लागत का कुछ हिस्सा अपने उत्पादों और सेवाओं की कीमतों में शामिल कर सकती हैं।
इस तरह ऊर्जा बाजार में शुरू हुआ दबाव धीरे-धीरे दूसरी वस्तुओं और सेवाओं तक पहुंच सकता है। अर्थशास्त्री इसी संभावना को लेकर चिंतित हैं कि महंगाई केवल तेल की कीमतों तक सीमित न रहकर अर्थव्यवस्था के अन्य हिस्सों में भी फैल सकती है।
भारत के लिए क्या मायने हैं?
रॉयटर्स के सर्वेक्षण में भारत के लिए भी महंगाई संबंधी अनुमान बढ़ने का रुझान सामने आया। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले तीन तिमाही सर्वेक्षणों के दौरान 2027 के लिए भारत के महंगाई अनुमान में संचयी रूप से 0.4 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत में महंगाई निश्चित रूप से 0.4 प्रतिशत बढ़ेगी। यह अर्थशास्त्रियों के पूर्वानुमान में हुआ बदलाव है, न कि वास्तविक महंगाई दर में दर्ज वृद्धि। वास्तविक स्थिति आने वाले महीनों में ऊर्जा कीमतों, खाद्य पदार्थों की आपूर्ति, रुपये की विनिमय दर, घरेलू मांग और मौद्रिक नीति जैसे कारकों पर निर्भर करेगी।
भारत जैसे देश के लिए अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार का रुख विशेष महत्व रखता है, क्योंकि आयातित ऊर्जा की लागत का असर परिवहन और उत्पादन के खर्च पर पड़ सकता है। यदि लंबे समय तक ऊर्जा महंगी रहती है, तो कुछ कारोबारियों के लिए लागत का प्रबंधन मुश्किल हो सकता है। हालांकि, इसका अंतिम असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव घरेलू बाजार तक किस सीमा तक पहुंचता है।
आम लोगों की जेब पर कैसे पड़ सकता है असर?
महंगाई का सबसे सीधा संबंध परिवारों के रोजमर्रा के खर्च से है। जब वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ती हैं, तो समान आय से पहले जितना सामान खरीदना संभव था, उतना खरीदना मुश्किल हो सकता है। इसका असर विशेष रूप से उन परिवारों पर अधिक पड़ सकता है जिनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन, आवास, परिवहन और बिजली जैसे आवश्यक खर्चों में जाता है।
ऊर्जा की कीमतें बढ़ने पर परिवहन और माल ढुलाई की लागत प्रभावित हो सकती है। इससे कुछ खाद्य पदार्थों, घरेलू उपयोग की वस्तुओं और अन्य उत्पादों के दामों पर दबाव पड़ सकता है। लेकिन हर वस्तु की कीमत केवल तेल से तय नहीं होती। फसल उत्पादन, मौसम, स्थानीय मांग, सरकारी कर और आपूर्ति व्यवस्था भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यदि कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो परिवारों को अपने बजट में बदलाव करना पड़ सकता है। कारोबारियों के लिए भी मजदूरी, कच्चे माल, बिजली और परिवहन का खर्च संभालना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसीलिए महंगाई को केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि आम लोगों की क्रय शक्ति और जीवन-यापन की लागत से जुड़ा मुद्दा माना जाता है।
केंद्रीय बैंक ब्याज दरों पर क्या फैसला ले सकते हैं?
महंगाई के बढ़ते दबाव से केंद्रीय बैंकों के सामने मुश्किल निर्णय आ सकते हैं। आम तौर पर जब महंगाई लगातार ऊंची बनी रहती है, तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाने या उन्हें लंबे समय तक ऊंचा रखने पर विचार कर सकते हैं। इससे कर्ज लेना महंगा हो सकता है और मांग पर नियंत्रण रखने में मदद मिल सकती है।
दूसरी ओर, ब्याज दरें बढ़ाने से कारोबार और उपभोक्ताओं के लिए ऋण की लागत भी बढ़ती है। इससे निवेश, मकान खरीदने, वाहन लेने और व्यवसाय के विस्तार पर असर पड़ सकता है। इसलिए केंद्रीय बैंकों को केवल महंगाई ही नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, रोजगार और वित्तीय स्थिरता को भी ध्यान में रखना पड़ता है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे में शामिल अर्थशास्त्रियों ने संकेत दिया कि यदि महंगाई का दबाव ऊर्जा से आगे बढ़कर अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में फैलता है, तो कुछ केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में और वृद्धि कर सकते हैं। हालांकि, सभी देशों में एक जैसी नीति अपनाई जाएगी, ऐसा जरूरी नहीं है। हर केंद्रीय बैंक अपने देश के आर्थिक आंकड़ों और परिस्थितियों के आधार पर फैसला करेगा।
महंगाई के बावजूद वैश्विक विकास के अनुमान बढ़े
इस सर्वेक्षण का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि महंगाई को लेकर चिंता बढ़ने के बावजूद अर्थशास्त्रियों ने वैश्विक आर्थिक विकास के अनुमान में सुधार किया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर का अनुमान 2026 के लिए 3.0 प्रतिशत और 2027 के लिए 3.2 प्रतिशत किया गया। जुलाई के सर्वेक्षण में ये अनुमान क्रमशः 2.9 प्रतिशत और 3.1 प्रतिशत थे।
इससे पता चलता है कि अर्थशास्त्री फिलहाल ऐसी स्थिति की संभावना देख रहे हैं, जिसमें आर्थिक गतिविधियां अपेक्षाकृत मजबूत रह सकती हैं, लेकिन कीमतों पर दबाव भी बना रह सकता है। यानी महंगाई और आर्थिक विकास एक साथ आगे बढ़ सकते हैं। यह स्थिति केंद्रीय बैंकों के लिए विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण होती है, क्योंकि कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदम आर्थिक गतिविधियों को धीमा भी कर सकते हैं।
रिपोर्ट में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI से संबंधित निवेश को भी कुछ अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक गतिविधियों को सहारा देने वाला कारक बताया गया है। पिछले वर्ष से वैश्विक स्तर पर AI तकनीक में एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक निवेश का उल्लेख किया गया। हालांकि, इस निवेश का लाभ सभी देशों और उद्योगों तक समान रूप से पहुंचेगा, यह निश्चित नहीं है।
ब्रिटेन, यूरो क्षेत्र और अमेरिका के अनुमान में भी बदलाव
सर्वेक्षण में अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं के लिए महंगाई के अनुमान में वृद्धि दर्ज की गई। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन तिमाही सर्वेक्षणों के दौरान 2027 के लिए महंगाई के मध्यक अनुमान में ब्रिटेन के लिए 0.7 प्रतिशत अंक, यूरो क्षेत्र के लिए 0.5 प्रतिशत अंक और अमेरिका के लिए 0.2 प्रतिशत अंक की संचयी वृद्धि हुई है।
ब्राजील के लिए भी इसी अवधि में अनुमान 0.5 प्रतिशत अंक बढ़ा। ये आंकड़े बताते हैं कि महंगाई को लेकर चिंता केवल उन देशों में नहीं है जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं, बल्कि विकसित बाजारों में भी कीमतों के दबाव की आशंका बढ़ रही है।
हालांकि, अलग-अलग देशों की वास्तविक महंगाई दरों की तुलना करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि उनके उपभोक्ता मूल्य सूचकांक, ऊर्जा बाजार, कर प्रणाली और मौद्रिक नीतियां अलग होती हैं। सर्वेक्षण के आंकड़े भविष्य के बारे में अर्थशास्त्रियों की अपेक्षाएं दर्शाते हैं, न कि आने वाले वर्ष की निश्चित आर्थिक तस्वीर।
आने वाले महीनों में किन संकेतों पर रहेगी नजर?
आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें, मध्य पूर्व की स्थिति, माल ढुलाई की लागत और प्रमुख देशों की महंगाई रिपोर्ट महत्वपूर्ण रहेंगी। इसके अलावा केंद्रीय बैंकों के ब्याज दर संबंधी फैसले और कंपनियों की लागत में होने वाले बदलाव भी यह समझने में मदद करेंगे कि मौजूदा दबाव कितना लंबे समय तक बना रह सकता है।
यदि ऊर्जा की कीमतें नीचे आती हैं और आपूर्ति व्यवस्था सामान्य होती है, तो महंगाई पर दबाव कम हो सकता है। इसके विपरीत, यदि संघर्ष लंबा खिंचता है या ऊर्जा और दूसरी वस्तुओं की लागत बढ़ती रहती है, तो महंगाई को नियंत्रित करना कठिन हो सकता है। फिलहाल अर्थशास्त्रियों के अनुमान इसी अनिश्चितता को दर्शाते हैं।
निष्कर्ष: रॉयटर्स के 27 अक्टूबर 2026 के सर्वेक्षण के अनुसार, वैश्विक महंगाई का दबाव 2027 तक बने रहने की आशंका बढ़ी है। 50 में से 31 अर्थव्यवस्थाओं के लिए अगले साल के महंगाई अनुमान बढ़ाए गए हैं, जबकि भारत के अनुमान में भी पिछले तीन तिमाही सर्वेक्षणों के दौरान वृद्धि हुई है। महंगे तेल और व्यापक लागत दबाव के कारण आम लोगों, कारोबार और केंद्रीय बैंकों के सामने चुनौती बनी रह सकती है। हालांकि, ये पूर्वानुमान हैं—महंगाई की वास्तविक दिशा आने वाले महीनों की आर्थिक और भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
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