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कपास आयात पर ड्यूटी छूट दिसंबर तक बढ़ाने की तैयारी! कपड़ा उद्योग को राहत की उम्मीद, किसानों पर भी पड़ेगा असर

कपास आयात पर ड्यूटी छूट दिसंबर तक बढ़ाने की तैयारी! कपड़ा उद्योग को राहत की उम्मीद, किसानों पर भी पड़ेगा असर

कपास आयात पर शुल्क छूट बढ़ाने की तैयारी, दिसंबर तक मिल सकती है राहत; कपड़ा उद्योग की लागत पर रहेगी नजर

नई दिल्ली, 26 अक्टूबर 2026। देश के कपड़ा उद्योग के लिए कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाने और उत्पादन लागत पर दबाव कम करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार कपास आयात पर सीमा शुल्क की छूट को दिसंबर 2026 के अंत तक बढ़ाने पर विचार कर रही है। Reuters की 26 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार से जुड़े और उद्योग जगत के तीन सूत्रों ने इस संभावित विस्तार की जानकारी दी है। हालांकि, इस संबंध में अंतिम सरकारी आदेश जारी होने की पुष्टि रिपोर्ट में नहीं की गई है। 

कपास की कीमतों में मजबूती, घरेलू उत्पादन को लेकर चिंता और कपड़ा मिलों की कच्चे माल की जरूरत इस प्रस्ताव के प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं। यदि छूट की अवधि बढ़ाई जाती है, तो आयातकों को अतिरिक्त समय तक बिना इस सीमा शुल्क के कपास मंगाने का अवसर मिल सकता है। इससे घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ने और कपड़ा निर्माताओं की लागत कम होने की संभावना है।

पहले कब तक मिली थी आयात शुल्क से छूट?

केंद्र सरकार ने कपास की उपलब्धता बेहतर बनाने के लिए 1 जून से 31 अक्टूबर 2026 तक कपास के आयात पर सीमा शुल्क की छूट दी थी। इस अवधि में सामान्य रूप से लागू होने वाले 11 प्रतिशत सीमा शुल्क से राहत देने का उद्देश्य कपड़ा उद्योग को पर्याप्त कच्चा माल उपलब्ध कराना और उत्पादन लागत को नियंत्रित रखने में मदद करना था। अब इस अवधि को दो महीने और बढ़ाकर दिसंबर के अंत तक करने की संभावना जताई गई है। <

ध्यान देने वाली बात यह है कि फिलहाल इसे प्रस्तावित विस्तार के रूप में ही समझना चाहिए। अंतिम सरकारी अधिसूचना जारी होने पर ही यह स्पष्ट होगा कि छूट को कितनी अवधि के लिए बढ़ाया गया है और नई व्यवस्था किन शर्तों के साथ लागू होगी।

घरेलू बाजार में कपास की कीमतें क्यों बनी हुई हैं?

नई कपास की आवक शुरू होने के बावजूद इस साल घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव कम होने की उम्मीद के अनुरूप राहत नहीं मिली है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, घरेलू कपास की कीमतें 9,000 रुपये प्रति 100 किलोग्राम से ऊपर बनी हुई थीं, जबकि नए सीजन के लिए सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य 8,717 रुपये प्रति 100 किलोग्राम बताया गया है।

कीमतों में मजबूती की एक प्रमुख वजह इस साल कपास उत्पादन को लेकर जताई जा रही चिंता है। रिपोर्ट में कम अनुकूल मानसून और उत्पादन घटने की आशंकाओं का उल्लेख किया गया है। जब घरेलू बाजार में उपलब्ध कपास मांग के मुकाबले कम पड़ती है, तो कपड़ा मिलों और अन्य खरीदारों को कच्चे माल के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। <

उत्पादन और मांग के बीच बढ़ सकता है अंतर

व्यापार क्षेत्र के अनुमानों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 के कपास सीजन में भारत का उत्पादन 2.9 करोड़ गांठ से नीचे रहने की आशंका है, जबकि मांग 3.4 करोड़ गांठ से अधिक हो सकती है। यहां एक गांठ का वजन 170 किलोग्राम माना जाता है।

यदि उत्पादन और मांग के बीच यह अंतर बना रहता है, तो घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाने के लिए आयात की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। आयात शुल्क में छूट मिलने से विदेशी कपास खरीदने की लागत कम हो सकती है, हालांकि वास्तविक लाभ अंतरराष्ट्रीय कीमतों, रुपये की विनिमय दर और माल ढुलाई के खर्च पर भी निर्भर करेगा। <

कपड़ा मिलों को कैसे मिल सकती है राहत?

कपास कपड़ा उद्योग के लिए एक प्रमुख कच्चा माल है। कपास की कीमत बढ़ने से सूत बनाने वाली मिलों और कपड़ा निर्माताओं की उत्पादन लागत प्रभावित होती है। इसके बाद लागत का असर कपड़े, परिधान और दूसरे वस्त्र उत्पादों के कारोबार पर भी पड़ सकता है।

यदि शुल्क छूट दिसंबर तक बढ़ती है, तो कपड़ा मिलों को आयातित कपास खरीदने के लिए अतिरिक्त समय मिल सकता है। इससे उन्हें घरेलू बाजार में महंगे कच्चे माल पर निर्भरता कम करने का विकल्प मिल सकता है। हालांकि, यह जरूरी नहीं कि आयात शुल्क में राहत का पूरा फायदा तुरंत ग्राहकों तक पहुंचे। अंतिम असर इस बात पर निर्भर करेगा कि बाजार में कपास की आपूर्ति कितनी बढ़ती है और अन्य उत्पादन खर्च किस स्तर पर रहते हैं।

कपड़ा उद्योग के प्रतिनिधियों का तर्क है कि कच्चे माल की लागत कम होने से भारतीय निर्माताओं को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिल सकती है। खास तौर पर वियतनाम और बांग्लादेश जैसे कपड़ा निर्यातक देशों के मुकाबले लागत प्रतिस्पर्धा बनाए रखना उद्योग के लिए महत्वपूर्ण है। 

अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया से बढ़ सकता है आयात

यदि सरकार शुल्क छूट बढ़ाने का औपचारिक फैसला करती है, तो भारत को अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से कपास खरीदने के लिए अतिरिक्त अवसर मिल सकता है। हालांकि, आयात में कितनी वृद्धि होगी, यह केवल सरकारी नीति पर निर्भर नहीं करेगा।

Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी कपास की कीमतें, ऊंचा माल ढुलाई खर्च और रुपये की कमजोरी आयात को महंगा बना सकते हैं। ऐसे में सीमा शुल्क हटने या उसकी छूट बढ़ने के बावजूद विदेशी कपास की कुल लागत भारतीय खरीदारों के लिए निर्णायक रहेगी। 

किसानों पर क्या पड़ सकता है असर?

कपास आयात शुल्क में छूट का असर केवल कपड़ा उद्योग तक सीमित नहीं रह सकता। घरेलू किसानों के लिए भी इसका महत्व है, क्योंकि आयातित कपास की उपलब्धता बढ़ने से भारतीय बाजार में कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।

एक ओर कपड़ा मिलों को सस्ता कच्चा माल मिलने की संभावना है, वहीं दूसरी ओर घरेलू कपास उत्पादकों को यह चिंता हो सकती है कि विदेशी कपास की बढ़ती आपूर्ति से उनकी उपज के बाजार भाव प्रभावित हों। इसका वास्तविक असर घरेलू उत्पादन, फसल की गुणवत्ता, बाजार में उपलब्ध स्टॉक और आयात की मात्रा पर निर्भर करेगा।

इसलिए सरकार के सामने कपड़ा उद्योग की कच्चे माल की जरूरत और किसानों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी है। आयात शुल्क की छूट बढ़ाने का प्रस्ताव इसी व्यापक बाजार परिस्थिति के बीच सामने आया है।

कपास आयात में पहले ही बढ़ोतरी

Reuters की रिपोर्ट में दिए गए व्यापार मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में भारत का कपास आयात सालाना आधार पर 63 प्रतिशत बढ़कर 1.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह बढ़ोतरी घरेलू बाजार में आपूर्ति की जरूरत और आयातित कपास की भूमिका को रेखांकित करती है। 

हालांकि, आयात में बढ़ोतरी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि घरेलू बाजार की सभी समस्याएं दूर हो गई हैं। कपास की कीमतों और उपलब्धता पर उत्पादन, मौसम, मांग, वैश्विक बाजार और परिवहन लागत जैसे कई कारकों का असर पड़ता है।

अब सरकार के फैसले पर टिकी नजर

कपास आयात पर शुल्क छूट बढ़ाने का प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब कपड़ा उद्योग कच्चे माल की लागत और उपलब्धता को लेकर दबाव महसूस कर रहा है। यदि केंद्र सरकार दिसंबर के अंत तक छूट जारी रखने की अधिसूचना देती है, तो आयातकों और कपड़ा मिलों को अपनी खरीद योजनाएं बनाने के लिए अतिरिक्त समय मिल सकता है।

फिलहाल, सबसे अहम बात यह है कि छूट बढ़ाने की तैयारी की खबर सामने आई है, लेकिन अंतिम सरकारी अधिसूचना की पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसे लागू हो चुका फैसला बताना सही नहीं होगा। आने वाले दिनों में सरकार का औपचारिक निर्णय ही तय करेगा कि कपास आयात पर शुल्क राहत आगे कितने समय तक जारी रहती है।

निष्कर्ष

कपास आयात पर 11 प्रतिशत सीमा शुल्क की छूट दिसंबर 2026 तक बढ़ाने की संभावित योजना कपड़ा उद्योग के लिए अहम साबित हो सकती है। इससे कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाने और लागत नियंत्रित करने में मदद मिलने की उम्मीद है। दूसरी ओर, घरेलू कपास किसानों पर संभावित असर और बाजार में कीमतों की दिशा भी महत्वपूर्ण रहेगी। अब सबकी नजर सरकार की आधिकारिक घोषणा पर है, जिससे स्पष्ट होगा कि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है या नहीं।


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