अमेरिका में अश्विनी वैष्णव को नहीं मिला आधिकारिक स्वागत, कांग्रेस की सुप्रिया श्रीनेत ने बताया “कूटनीतिक विफलता”
- byAman Prajapat
- 13 January, 2026
पुरानी कहावत है—रिश्ते शब्दों से नहीं, व्यवहार से पहचाने जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में यह बात और भी गहरी हो जाती है, जहां एक छोटा-सा इशारा भी बड़े संदेश दे जाता है। इसी संदर्भ में अमेरिका दौरे पर गए केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव को लेकर एक राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है, जिसने भारत की विदेश नीति पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है।
कांग्रेस पार्टी की वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने आरोप लगाया है कि अमेरिका पहुंचने पर अश्विनी वैष्णव को किसी भी वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी द्वारा औपचारिक रूप से रिसीव नहीं किया गया। उनके मुताबिक यह केवल एक प्रोटोकॉल की चूक नहीं, बल्कि भारत सरकार की कूटनीतिक विफलता का स्पष्ट संकेत है।
✍️ सुप्रिया श्रीनेत का तीखा हमला
सुप्रिया श्रीनेत ने सोशल मीडिया और प्रेस बयानों के ज़रिये केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला। उनका कहना था कि जब भारत खुद को वैश्विक मंच पर एक मजबूत शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, तब इस तरह की घटनाएं सरकार के दावों की पोल खोल देती हैं। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान अपने आप नहीं मिलता, उसे मजबूत और संतुलित विदेश नीति से अर्जित करना पड़ता है।
उनके शब्दों में, “अगर भारत के केंद्रीय मंत्री को दुनिया के सबसे ताकतवर देश में कोई अधिकारी रिसीव करने नहीं आता, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। यह सरकार की विदेश नीति की असफलता को दर्शाता है।”
🌍 विदेश नीति पर उठते सवाल
कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने विदेश नीति को इवेंट-मैनेजमेंट तक सीमित कर दिया है। बड़ी-बड़ी तस्वीरें, भव्य भाषण और मंचीय दोस्ती तो दिखती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर सम्मान और भरोसे में कमी नजर आती है।
राजनयिक हलकों में भी यह माना जाता है कि प्रोटोकॉल केवल औपचारिकता नहीं होता। यह देशों के आपसी रिश्तों की गंभीरता और प्राथमिकता को दर्शाता है। किसी केंद्रीय मंत्री का स्वागत न होना कई तरह के संकेत देता है—चाहे वह व्यस्तता हो, प्राथमिकता में बदलाव हो या रिश्तों में ठंडापन।
🏛️ सरकार की ओर से जवाब
हालांकि इस मुद्दे पर सरकार या भाजपा की ओर से सीधे तौर पर कोई तीखी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन पार्टी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि ऐसे दौरे अक्सर कार्यसूची आधारित होते हैं और हर दौरे पर औपचारिक स्वागत जरूरी नहीं होता। उनका यह भी तर्क है कि भारत-अमेरिका संबंध मजबूत हैं और किसी एक घटना से उन पर सवाल उठाना गलत है।Congress’ Supriya Shrinate Calls It a “Diplomatic Failure” as No US Official Receives Ashwini Vaishnaw
⚖️ राजनीति बनाम कूटनीति
यह पूरा विवाद एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि क्या विदेश नीति को राजनीतिक चश्मे से देखा जाना चाहिए या राष्ट्रीय हितों के नजरिये से। विपक्ष जहां इसे सरकार की नाकामी बता रहा है, वहीं सत्ता पक्ष इसे बेवजह तूल देने की कोशिश करार दे रहा है।
लेकिन सच्चाई यही है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर हर कदम मायने रखता है। स्वागत, मुलाकातें, संयुक्त बयान—सब कुछ एक कहानी कहते हैं। और इस बार कहानी ने बहस को जन्म दे दिया है।
🔍 निष्कर्ष
अश्विनी वैष्णव के अमेरिका दौरे से जुड़ा यह मामला सिर्फ एक नेता या एक पार्टी तक सीमित नहीं है। यह भारत की वैश्विक छवि, कूटनीतिक प्राथमिकताओं और विदेश नीति की दिशा पर सवाल उठाता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस आलोचना को कैसे संभालती है और क्या इससे भारत-अमेरिका रिश्तों की तस्वीर पर कोई असर पड़ता है।
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जीणमाता मंदिर के पट...
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