छत्तीसगढ़ में पश्चिम बंगाल के प्रवासी मजदूरों पर हमला, तृणमूल सूत्रों का दावा—आठ से अधिक घायल
- byAman Prajapat
- 06 January, 2026
छत्तीसगढ़ की धरती, जो खनिजों और मेहनतकश हाथों की कहानी कहती है, एक बार फिर सुर्खियों में है—इस बार वजह है प्रवासी मजदूरों पर कथित हमला। तृणमूल कांग्रेस के सूत्रों का दावा है कि पश्चिम बंगाल से काम की तलाश में आए कम से कम आठ प्रवासी मजदूरों को छत्तीसगढ़ में हिंसा का शिकार बनाया गया। यह खबर सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि उन चेहरों की है जो रोज़ी-रोटी के लिए घर-बार छोड़ते हैं और अनजाने शहरों में पसीना बहाते हैं।
सूत्रों के अनुसार, पीड़ित मजदूर निर्माण और अन्य दिहाड़ी कार्यों से जुड़े थे। आरोप है कि स्थानीय स्तर पर किसी विवाद के बाद उनके साथ मारपीट की गई, जिसमें कई मजदूर घायल हुए। घायलों को उपचार के लिए नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्रों में ले जाया गया। हालांकि, प्रशासन की ओर से विस्तृत आधिकारिक बयान सामने आने का इंतज़ार है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज़ हो चुकी है।
तृणमूल कांग्रेस ने इस घटना को गंभीर बताते हुए कहा है कि प्रवासी मजदूर देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। उनका कहना है कि जो लोग दूसरे राज्यों में मेहनत करने जाते हैं, उन्हें सुरक्षा, सम्मान और कानून का पूरा संरक्षण मिलना चाहिए। पार्टी के नेताओं ने मांग की है कि घटना की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों की पहचान की जाए और कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
यह मामला केवल एक राज्य या पार्टी तक सीमित नहीं है। भारत की परंपरा रही है—अतिथि देवो भव। सदियों से लोग एक-दूसरे के राज्यों में काम करने जाते रहे हैं, भाषा बदली, पहनावा बदला, पर मेहनत का सम्मान हमेशा रहा। ऐसे में प्रवासी मजदूरों पर हिंसा के आरोप उस परंपरा पर सीधा सवाल उठाते हैं। सच कड़वा है—अगर मजदूर सुरक्षित नहीं, तो विकास का दावा खोखला है।
स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर भी निगाहें टिकी हैं। कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य का कर्तव्य है, और ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई विश्वास बहाल करती है। मजदूर संगठनों का कहना है कि प्रवासी श्रमिक अक्सर शिकायत दर्ज कराने से कतराते हैं—डर, भाषा की बाधा और रोज़गार छिनने की चिंता उन्हें चुप करा देती है। यही चुप्पी कई बार हिंसा को बढ़ावा देती है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज़ हैं। जहां तृणमूल कांग्रेस ने केंद्र और संबंधित राज्य सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है, वहीं अन्य दलों ने भी घटना की निंदा करते हुए मजदूरों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही है। सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा गर्म है—लोग सवाल पूछ रहे हैं, जवाब मांग रहे हैं। सीधी बात है: काम करने गया मजदूर अगर घर लौटते वक्त डर में है, तो सिस्टम फेल है।
अंतरराज्यीय पलायन भारत की हकीकत है। गांवों से शहरों तक, राज्यों की सीमाएं पार कर, करोड़ों लोग रोज़गार की तलाश में निकलते हैं। ये लोग न किसी राजनीतिक झंडे के नीचे होते हैं, न किसी भाषाई खांचे में—इनका धर्म मेहनत है। ऐसे में उनकी सुरक्षा पर राजनीति नहीं, नीति चाहिए। ठोस नियम, सख़्त अमल और मानवीय संवेदना—तीनों साथ चलें, तभी बात बनेगी।
घटना के बाद पीड़ित परिवारों की चिंता स्वाभाविक है। घर से दूर, अनजाने माहौल में चोट लगना सिर्फ शरीर का दर्द नहीं देता, मन को भी तोड़ता है। परंपरागत समाज जानता है—मेहमान की रक्षा मेजबान की जिम्मेदारी होती है। यही संस्कार हमारी पहचान रहे हैं। उन्हें बचाए रखना आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
आगे की राह साफ़ होनी चाहिए। जांच तेज़ हो, सच सामने आए, और न्याय दिखे—काग़ज़ों में नहीं, ज़मीन पर। प्रवासी मजदूरों के लिए हेल्पलाइन, स्थानीय भाषा में सहायता, और ठेकेदारों की जवाबदेही तय करना समय की मांग है। साथ ही, राज्यों के बीच समन्वय मजबूत हो, ताकि किसी भी कोने में काम करने वाला मजदूर खुद को अकेला न समझे।
यह खबर चेतावनी भी है और मौका भी—चेतावनी इसलिए कि लापरवाही महंगी पड़ती है, और मौका इसलिए कि हम अपनी पुरानी, मजबूत परंपराओं की ओर लौटें। मेहनत का सम्मान, इंसान की सुरक्षा, और कानून की निष्पक्षता—यही वो स्तंभ हैं जिन पर भरोसे का भारत खड़ा होता है। सच बोलें तो यही रास्ता है, बाकी सब शोर है।
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जीणमाता मंदिर के पट...
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