भाजपा का चौकाने वाला राजनीतिक खेल: कांग्रेस-AIMIM संग गठबंधन, फड़नवीस ने किया खारिज, कार्रवाई की चेतावनी
- byAman Prajapat
- 07 January, 2026
वो दिन कुछ अलग था, जब महाराष्ट्र की मिट्टी राजनीति की गर्मी से बैचेनी महसूस कर रही थी। स्थानीय निकायों के चुनाव के बाद, जनता ने अपना फैसला सुना दिया — लेकिन सत्ता की राहें वही पुरानी किताब में लिखी नियमों से हटकर कुछ अलग मोड़ लेने लगीं। भाजपा, जिस पर हमेशा अपनी धुर-विपक्षी कांग्रेस पर ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का नारा बुलंद करने का दावा रहा है, उसने एक ऐसे कदम की ओर बढ़ चला जिसने राज्य की राजनीतिक हवा में तूफान ला दिया।
अंबरनाथ नगर परिषद में भाजपा के स्थानीय नेता वो हर चाल चली जो पार्टी हाई-कमांड की किताब के पन्नों में नहीं थी। वहाँ भाजपा ने कांग्रेस और अजित पवार-नेतृत्व वाली एनसीपी के साथ मिलकर एक ‘अंबरनाथ विकास अगादी’ बनाई, जिससे शिवसेना (शिंदे गुट) जैसे मजबूत साथी को भी पीछे छोड़ दिया गया। इस गठबंधन ने महापौर और कई महत्वपूर्ण पदों पर कब्जा कर लिया, और जनता के मन में एक सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर ये अचानक बदलाव क्यों?
और जैसे ही खबर सामने आई, पार्टी के वरिष्ठ नेता देवेंद्र फड़नवीस मैदान पर उतर आए — उन आँखों में वही पुरानी सख्ती, वही वही पुराना आदेश, जैसे कोई इतिहास का अध्याय अचानक पलट गया हो। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाजपा कभी भी कांग्रेस या AIMIM के साथ गठबंधन नहीं करेगी; अगर किसी स्थानीय नेता ने ऐसा कदम उठाया है तो वह संगठन के अनुशासन का उल्लंघन है। ऐसे समझो जैसे कोई कवि अपनी पंक्तियों से हटकर नई लय गुनगुनाने लगे तो मुख्य गीतकार तुरंत उसे रोक दे।
फड़नवीस ने मीडिया से कहा कि पार्टी ने पहले ही निर्देश जारी कर दिए हैं कि इन गठबंधनों को वापस लिया जाए। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि जो नेता पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करेंगे, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। यानी जैसे किसी गुरुकुल में अगर शिष्य अपनी मरजी से अध्यापक की बातों के खिलाफ कर्म करे, तो गुरु निश्चय ही उसे खोजना सीखाएंगे।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती — राजनीतिक गलियारों में विपक्षी दलों ने इस कदम को ‘सत्ता के लिए opportunistic’ बताया। शिवसेना (UBT) के सांसद संजय राउत ने कहा कि अमितशाह की पार्टी किसी भी हद तक जा सकती है सिर्फ सत्ता को पकड़ने के लिए, और विपक्ष के समीकरणों ने इस बात को हवा दी कि भाजपा के भीतर ही मतभेद हैं। यही नहीं, भाजपा ने अकोट नगर परिषद में AIMIM के साथ भी एक अलग मंच बनाया, जहाँ भाजपा के अलावा थोकतान में कई दलों ने समर्थन दिया — लेकिन इसे भी फड़नवीस ने पटरी से हट जाने वाली घटना कहा।
अब सोचिए: एक तरफ पार्टी का राष्ट्रीय नारा, ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’, और दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर वही पार्टी कांग्रेस के साथ बैठकर निकायों पर कब्जा कर ले रही है। यह वही विरोधाभास है, जिस पर राजनीतिक जानकार भी सिर खुजाने पर मजबूर हैं। कुछ लोग इसे रणनीति कहते हैं, कुछ इसे अनुशासनहीनता। पर असल में, जनता के दिलों और सोच में यह सवाल गूंजता है कि क्या राजनीतिक समीकरण अब समय की धूंध में बदलने लगे हैं?
फड़नवीस ने स्पष्ट किया कि संगठन की वरिष्ठता के बिना किये गए किसी भी गठबंधन को पार्टी मंजूर नहीं करेगी और वह इस तरह के फैसलों को निरस्त करने के निर्देश दे चुके हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि अनुशासन तोड़ने वालों के खिलाफ पार्टी सख्त कार्यवाही करेगी, यह संदेश राजनीतिक अखाड़े में एक गहरी लकीर खींचता नजर आ रहा है।

लेकिन राजनीतिक विरोधी दलों के सुर भी तेज हुए — कुछ ने भाजपा के फैसले को ‘नैतिकता के खिलाफ’ बताया, कुछ ने कहा कि यह केवल सत्ता की भूख को दिखाता है। जैसे ही यह खबर मीडिया पर फैलती गई, हर राजनीतिक विश्लेषक, हर अखबार, हर फेसबुक-ट्वीटर वाले शख्स ने इस घटना पर अपनी राय जमा दी। अनुशासन, सत्ता, गठबंधन — राजनीति का ये वे शब्द हैं जो हमेशा से समाज के दिल में गूंजते आए हैं, पर इस बार वो और तेज़ गूंज रहे हैं, क्योंकि जनता ने इसे सिर्फ एक खबर से अधिक एक प्रतीक माना है।
आज भी जैसे ही आप इन शब्दों को पढ़ रहे हैं, महाराष्ट्र का राजनीतिक पटल और चुनाव की राजनीति का ये अध्याय जैसे एक पुरानी गाथा में नया मोड़ जोड़ रहा है — एक ऐसा मोड़ जो बताता है कि राजनीति में नियम कभी सख्त नहीं रहते, पर जब नेता उन्हें तोड़ते हैं, तो कैसे पार्टी के सख्त स्वर उभर आते हैं।
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जीणमाता मंदिर के पट...
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