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“PoK में बढ़ी आजादी की आवाज, चर्चा में आया 1947 का वो दस्तावेज जो भारत के दावे को देता है ऐतिहासिक आधार”

“PoK में बढ़ी आजादी की आवाज, चर्चा में आया 1947 का वो दस्तावेज जो भारत के दावे को देता है ऐतिहासिक आधार”

PoK में आजादी की मांग के बीच चर्चा में आया ऐतिहासिक दस्तावेज, जानिए क्या है भारत के दावे का आधार

नई दिल्ली: पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर यानी PoK को लेकर एक बार फिर इतिहास और 1947 के घटनाक्रम की चर्चा तेज है। इसी बीच जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय से जुड़ा Instrument of Accession यानी विलय-पत्र चर्चा में है। भारत के आधिकारिक पक्ष में इस दस्तावेज को जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और कानूनी आधार माना जाता है।

क्या है Instrument of Accession?

1947 में ब्रिटिश शासन खत्म होने के बाद रियासतों के सामने भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का विकल्प था। जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को Instrument of Accession पर हस्ताक्षर किए। दस्तावेज में जम्मू-कश्मीर राज्य के भारत के डोमिनियन में शामिल होने की घोषणा की गई थी।

इस दस्तावेज के तहत शुरुआत में भारत के अधिकार मुख्य रूप से रक्षा, विदेश मामले और संचार जैसे विषयों तक निर्धारित थे। उस समय रियासतों के भारत में विलय के लिए Instrument of Accession एक संवैधानिक प्रक्रिया थी।

PoK का विवाद कैसे शुरू हुआ?

1947 में जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के बाद क्षेत्र में सैन्य संघर्ष शुरू हुआ। पाकिस्तान समर्थित कबायली लड़ाकों के हमले और उसके बाद भारतीय सैनिकों की तैनाती ने विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा दिया।

इसके बाद जम्मू-कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के नियंत्रण में चला गया, जिसे भारत Pakistan-occupied Kashmir (PoK) कहता है। पाकिस्तान इसे Azad Jammu and Kashmir और उससे अलग Gilgit-Baltistan के रूप में प्रशासित करता है।

भारत के दावे में दस्तावेज की क्या भूमिका है?

भारत का तर्क है कि जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन शासक ने कानूनी प्रक्रिया के तहत भारत में विलय किया था। इसलिए भारत के अनुसार पूरे जम्मू-कश्मीर पर उसका दावा ऐतिहासिक दस्तावेजों और 1947 के विलय की प्रक्रिया पर आधारित है।

Instrument of Accession के मूल पाठ में महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत के डोमिनियन में शामिल होने की घोषणा दर्ज है।

हालांकि, PoK की वर्तमान राजनीतिक स्थिति और कश्मीर विवाद को लेकर भारत और पाकिस्तान के रुख अलग-अलग हैं। इसलिए इस दस्तावेज को भारत के दावे के ऐतिहासिक आधार के रूप में देखना चाहिए, न कि यह कहना कि इससे मौजूदा विवाद अपने आप समाप्त हो जाता है।

PoK में विरोध और स्थानीय मुद्दे

PoK में पिछले कुछ समय से राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं। 2026 में वहां प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने और मौतों की रिपोर्ट सामने आई थी। हालांकि इन प्रदर्शनों के तत्काल कारणों में स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक समस्याएं और प्रशासन से जुड़े मुद्दे शामिल थे; इन्हें सीधे तौर पर भारत में विलय की मांग मानना सही नहीं होगा।

क्यों महत्वपूर्ण है 1947 का यह दस्तावेज?

Instrument of Accession इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह 1947 के उस संवैधानिक दौर का दस्तावेज है जिसमें रियासतों के भारत में शामिल होने की प्रक्रिया तय की गई थी। जम्मू-कश्मीर के मामले में महाराजा हरि सिंह के हस्ताक्षर वाला यह दस्तावेज भारत के ऐतिहासिक दावे की चर्चा में केंद्रीय भूमिका रखता है।

यानी आसान भाषा में: 1947 में महाराजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे। आज भी यही दस्तावेज कश्मीर विवाद के इतिहास और भारत के दावे को समझने में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है।


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