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फर्जी सुप्रीम कोर्ट आदेश से उम्रकैदी को जेल से कराया रिहा, 8 साल बाद DIG गिरफ्तार; 2018 की पूरी कहानी ने मचाई हलचल

फर्जी सुप्रीम कोर्ट आदेश से उम्रकैदी को जेल से कराया रिहा, 8 साल बाद DIG गिरफ्तार; 2018 की पूरी कहानी ने मचाई हलचल

फर्जी सुप्रीम कोर्ट आदेश से उम्रकैदी को जेल से कराया रिहा, 8 साल बाद DIG गिरफ्तार; 2018 की पूरी कहानी ने मचाई हलचल

कर्नाटक में जेल प्रशासन से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां कथित तौर पर फर्जी सुप्रीम कोर्ट आदेश के जरिए उम्रकैद की सजा काट रहे एक कैदी को जेल से बाहर निकाल दिया गया। इस मामले में अब कर्नाटक प्रिजन एंड करेक्शनल सर्विसेज के DIG एम. सोमशेखर को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। मामला करीब आठ साल पुराना है और 2018 में बेंगलुरु सेंट्रल जेल से कैदी की रिहाई से जुड़ा है।

पुलिस के मुताबिक, सोमशेखर उस समय बेंगलुरु सेंट्रल जेल के चीफ सुपरिंटेंडेंट के पद पर तैनात थे। इसी दौरान उम्रकैद की सजा काट रहे कैदी शंकर ए. को कथित तौर पर सुप्रीम कोर्ट के एक फर्जी आदेश के आधार पर 13 नवंबर 2018 को जेल से रिहा कर दिया गया था। अब इस मामले की जांच आगे बढ़ने के बाद तत्कालीन जेल अधिकारी की भूमिका भी जांच के दायरे में आई और उन्हें पुलिस हिरासत में लिया गया है।

2001 के अपहरण मामले में हुई थी उम्रकैद

जांच के अनुसार शंकर ए. को वर्ष 2001 के फिरौती के लिए अपहरण के मामले में दोषी ठहराया गया था। बेंगलुरु की फास्ट ट्रैक कोर्ट-I ने 12 जुलाई 2004 को उसे उम्रकैद की सजा सुनाई थी और जुर्माना भी लगाया था। बाद में मामले में उसकी अपील कर्नाटक हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची, लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक उसकी सजा बरकरार रही।

इसके बावजूद नवंबर 2018 में जेल अधिकारियों के सामने ऐसा दस्तावेज पेश किया गया, जिसे सुप्रीम कोर्ट का आदेश बताया गया। दस्तावेज में कथित तौर पर कैदी की रिहाई का निर्देश दिखाया गया था।

फर्जी आदेश के आधार पर 13 नवंबर 2018 को रिहाई

पुलिस जांच के अनुसार, कथित फर्जी आदेश पर 2 नवंबर 2018 की तारीख दिखाई गई थी। इसी दस्तावेज के आधार पर जेल प्रशासन ने 13 नवंबर को शंकर को जेल से बाहर जाने की अनुमति दे दी।

बाद की जांच में सामने आया कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई आदेश जारी ही नहीं किया था। जब जेल प्रशासन ने दस्तावेज की प्रामाणिकता की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के संबंधित अधिकारी से संपर्क किया, तो कथित आदेश को फर्जी बताया गया।

जेल के कर्मचारी पर भी गंभीर आरोप

मामले की जांच में जेल के कन्विक्ट प्रिजनर सेक्शन में काम करने वाले कर्मचारी श्रीकांत एस. का नाम सामने आया। पुलिस के अनुसार, उस समय वह सेकंड डिवीजन असिस्टेंट के पद पर था और बाद में फर्स्ट डिवीजन असिस्टेंट बन गया।

जांच एजेंसियों का आरोप है कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने में उसकी भूमिका थी। रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि कैदी के परिवार की ओर से कथित तौर पर रकम दिए जाने की बात जांच का हिस्सा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, करीब 6 लाख रुपये दिए जाने का आरोप है। हालांकि इन आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान ही होगी।

आठ साल तक कैसे नहीं खुला राज?

इस मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर दस्तावेज फर्जी था, तो उसकी जांच और सत्यापन के बिना एक उम्रकैदी को जेल से बाहर कैसे जाने दिया गया।

मामला कई वर्षों तक सामने नहीं आया। वर्ष 2026 में बेंगलुरु सेंट्रल जेल के प्रभारी अधीक्षक की शिकायत के बाद पुलिस जांच शुरू हुई। 20 मई 2026 को परप्पना अग्रहारा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई गई और इसके बाद फर्जी दस्तावेजों तथा रिहाई की पूरी प्रक्रिया की जांच शुरू हुई।

जांच के दौरान अधिकारियों ने यह पता लगाने की कोशिश की कि फर्जी सुप्रीम कोर्ट आदेश किसने तैयार किया, जेल में उसे किसने स्वीकार किया और कैदी को रिहा करने की प्रक्रिया में किन-किन अधिकारियों की भूमिका रही।

अब DIG एम. सोमशेखर पर कार्रवाई

पुलिस ने अब तत्कालीन चीफ सुपरिंटेंडेंट और वर्तमान में DIG पद पर तैनात एम. सोमशेखर को गिरफ्तार किया है। पुलिस का आरोप है कि उन्होंने जांच में सहयोग नहीं किया और मामले से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई।

6 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, सोमशेखर को गिरफ्तार किए जाने के बाद पुलिस हिरासत में भेजा गया है और उनसे मामले में पूछताछ की जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक उनकी पुलिस कस्टडी 9 अक्टूबर तक है।

पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि फर्जी आदेश तैयार करने से लेकर कैदी को जेल से बाहर निकालने तक पूरी प्रक्रिया में कौन-कौन लोग शामिल थे।

जांच में सामने आए आरोपों से मामला और गंभीर

जांच के दौरान कैदी की पत्नी से भी पूछताछ की गई। पुलिस के अनुसार, उसके बयान और अन्य जांच सामग्री के आधार पर सोमशेखर की कथित भूमिका की जांच आगे बढ़ी। अधिकारियों ने मामले को केवल फर्जी दस्तावेज के इस्तेमाल तक सीमित नहीं रखा है और जेल प्रशासन से जुड़े अन्य आरोपों की भी जांच की जा रही है।

इन आरोपों की प्रकृति गंभीर है और मामले में जांच अभी जारी है। इसलिए पुलिस द्वारा लगाए गए आरोपों को अदालत में साबित होना बाकी है।

जेल व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल

इस घटना ने जेलों में कैदियों की रिहाई से जुड़े दस्तावेजों की जांच और सत्यापन प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए हैं। सुप्रीम कोर्ट के नाम से तैयार कथित फर्जी आदेश को वास्तविक मानकर एक उम्रकैदी की रिहाई हो जाना प्रशासनिक स्तर पर गंभीर चूक के रूप में देखा जा रहा है।

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस व्यक्ति को उम्रकैद की सजा मिली थी, वह कथित फर्जी न्यायिक दस्तावेज के आधार पर लगभग आठ साल तक जेल से बाहर रहा।

अब पुलिस की जांच इस बात पर केंद्रित है कि इस पूरे कथित नेटवर्क में कितने लोग शामिल थे और किस स्तर पर दस्तावेजों की जांच में चूक हुई।

फिलहाल DIG एम. सोमशेखर पुलिस हिरासत में हैं और मामले की जांच जारी है। अदालत में आरोपों की सुनवाई और जांच पूरी होने के बाद ही प्रत्येक आरोपी की भूमिका और जिम्मेदारी पर अंतिम स्थिति स्पष्ट होगी।


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