Follow Us:

Stay updated with the latest news, stories, and insights that matter — fast, accurate, and unbiased. Powered by facts, driven by you.

नवरात्रि में गरबा की धूम! मां अंबे की आराधना से जुड़ा गुजरात का लोकनृत्य बना देशभर की पहचान

नवरात्रि में गरबा की धूम! मां अंबे की आराधना से जुड़ा गुजरात का लोकनृत्य बना देशभर की पहचान

नवरात्रि में गरबा की धूम! मां अंबे की आराधना से जुड़ा गुजरात का लोकनृत्य बना देशभर की पहचान

नई दिल्ली। नवरात्रि का त्योहार मां दुर्गा की आराधना, भक्ति और उत्साह का पर्व है। इन नौ दिनों में देशभर के मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर विशेष आयोजन होते हैं। वहीं, गुजरात का पारंपरिक लोकनृत्य गरबा नवरात्रि के उत्सव को एक अलग रंग देता है। ढोल की थाप, पारंपरिक संगीत, रंग-बिरंगे परिधान और गोल घेरे में थिरकते लोग गरबा की पहचान बन चुके हैं। आज यह लोकनृत्य गुजरात की सीमाओं से निकलकर देश के अनेक शहरों में लोकप्रिय हो चुका है।

मां अंबे की आराधना से जुड़ी है गरबा की परंपरा

गरबा केवल मनोरंजन या नृत्य का माध्यम नहीं है, बल्कि इसका गहरा धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। गुजरात में नवरात्रि के दौरान मां अंबे और शक्ति की उपासना के साथ गरबा करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। पारंपरिक रूप से गरबा में देवी शक्ति के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है और भक्त सामूहिक रूप से नृत्य करते हुए उत्सव में भाग लेते हैं।

गरबा शब्द को अक्सर गुजराती शब्द ‘गर्भ’ से जोड़ा जाता है। पारंपरिक गरबा में मिट्टी के छिद्रयुक्त पात्र, जिसे ‘गरबी’ या ‘गरबो’ कहा जाता है, को देवी शक्ति और जीवन के प्रतीक के रूप में सजाया जाता है। हालांकि, गरबा की परंपराओं और उनके अर्थ में क्षेत्र के अनुसार भिन्नताएं भी मिलती हैं।

ढोल की थाप पर गोल घेरे में होता है गरबा

गरबा की सबसे खास पहचान इसका गोलाकार नृत्य है। इसमें महिला-पुरुष और अलग-अलग आयु वर्ग के लोग संगीत की लय पर तालियां बजाते हुए गोल घेरे में नृत्य करते हैं। जैसे-जैसे संगीत की गति बढ़ती है, नृत्य के कदम भी तेज होते जाते हैं।

गरबा में पारंपरिक गुजराती लोकगीतों के साथ मां अंबे की स्तुति वाले गीत गाए जाते हैं। आजकल पारंपरिक संगीत के साथ आधुनिक संगीत का इस्तेमाल भी देखने को मिलता है। इसके बावजूद गरबा की मूल पहचान सामूहिक भागीदारी, भक्ति और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी हुई है।

पारंपरिक पोशाकें बढ़ाती हैं उत्सव की रौनक

नवरात्रि के गरबा आयोजनों में पारंपरिक परिधान विशेष आकर्षण का केंद्र रहते हैं। महिलाएं अक्सर चनिया-चोली, रंगीन घाघरा और कढ़ाईदार दुपट्टे पहनती हैं, जबकि पुरुष केडियू और धोती या पारंपरिक गुजराती पोशाक में नजर आते हैं। शीशे का काम, रंगीन कढ़ाई और पारंपरिक आभूषण इन परिधानों को खास बनाते हैं।

बड़े शहरों में आयोजित गरबा कार्यक्रमों में हजारों लोग एक साथ शामिल होते हैं। कई स्थानों पर सर्वश्रेष्ठ पारंपरिक पोशाक, नृत्य और समूह प्रस्तुति के लिए प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं।

गुजरात से निकलकर देशभर में लोकप्रिय हुआ गरबा

अहमदाबाद, वडोदरा और गुजरात के दूसरे शहरों में गरबा नवरात्रि का प्रमुख आकर्षण है। इसके अलावा जयपुर, दिल्ली, मुंबई, पुणे और अन्य शहरों में भी बड़े गरबा आयोजन होने लगे हैं। विभिन्न राज्यों के लोग इस लोकनृत्य को सीखते हैं और नवरात्रि के दौरान आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेते हैं।

गरबा की लोकप्रियता ने गुजरात की लोकसंस्कृति, संगीत और पारंपरिक परिधानों को देशभर में पहचान दिलाई है। विदेशों में बसे भारतीय समुदायों के बीच भी गरबा आयोजन किए जाते हैं, जिससे यह सांस्कृतिक परंपरा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंची है।

भक्ति, एकता और संस्कृति का संगम है गरबा

गरबा की खासियत यह है कि इसमें लोग सामूहिक रूप से भाग लेते हैं। नृत्य के दौरान उम्र, भाषा और क्षेत्र की सीमाएं पीछे छूट जाती हैं और उत्सव में शामिल लोग एक साझा सांस्कृतिक अनुभव का हिस्सा बनते हैं। नवरात्रि के दौरान गरबा मां अंबे के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के साथ-साथ लोककला और सामुदायिक मेलजोल को भी बढ़ावा देता है।

यही वजह है कि गरबा आज केवल गुजरात का पारंपरिक लोकनृत्य नहीं, बल्कि नवरात्रि उत्सव की एक व्यापक पहचान बन चुका है। ढोल की थाप और मां अंबे के जयकारों के बीच गरबा की रंगत भक्तों के उत्साह को और बढ़ा देती है।


Note: Content and images are for informational use only. For any concerns, contact us at info@rajasthaninews.com.

Share: