यूरोप की शाही लक्ज़री ट्रेन: विंटेज डिब्बों में बीता ज़माना, जानिए अंदर की दुनिया और प्रति व्यक्ति खर्च
- byAman Prajapat
- 27 January, 2026
यूरोप की रेल पटरियों पर दौड़ती यह ट्रेन कोई आम साधन नहीं, बल्कि चलता-फिरता इतिहास है। जैसे ही यात्री इसके विंटेज डिब्बों में कदम रखते हैं, आधुनिक दुनिया पीछे छूट जाती है और सामने खुलता है 1920–30 के दशक का वह दौर, जहाँ सफ़र भी शान हुआ करता था।
🚆 एक ट्रेन, जो समय से आगे नहीं—पीछे ले जाती है
इस लक्ज़री ट्रेन के हर कोच को हाथ से तराशा गया है। चमकदार लकड़ी की दीवारें, पीतल की फिटिंग, रेशमी पर्दे और मुलायम कालीन—सब कुछ ऐसा लगता है जैसे किसी पुरानी यूरोपीय फ़िल्म का सीन चल रहा हो। यह ट्रेन सिर्फ़ चलती नहीं, कहानी सुनाती है।
🛋️ विंटेज कारriages: शाही ठाठ का असली मतलब
हर डिब्बा अपने आप में एक शाही कमरा है। स्लीपिंग केबिन इतने आरामदायक हैं कि होटल भी शर्मा जाए। दिन में यही केबिन बैठने की जगह बन जाते हैं और रात को इन्हें बेडरूम में बदल दिया जाता है—वो भी स्टाफ़ की मदद से, बिना शोर-शराबे के।
🍽️ डाइनिंग कार: जहाँ खाना भी कला है
यहाँ खाना सिर्फ़ परोसा नहीं जाता, सेलिब्रेट किया जाता है। सफ़ेद टेबलक्लॉथ, चांदी के कटलरी, क्रिस्टल ग्लास और यूरोप के टॉप शेफ़्स द्वारा तैयार किए गए व्यंजन। फ्रेंच, इटालियन और क्लासिक यूरोपियन डिशेज़—हर प्लेट एक अनुभव।
🧑✈️ सेवा: पुराने ज़माने की तहज़ीब
इस ट्रेन की सेवा वो चीज़ है जो आज की दुनिया में लगभग गायब हो चुकी है। स्टाफ़ आपको नाम से जानता है, आपकी पसंद याद रखता है और बिना कहे ज़रूरत समझ लेता है। यह फाइव-स्टार नहीं, ओल्ड-स्कूल रॉयल सर्विस है।
🌍 रूट्स: यूरोप को देखने का सबसे शाही तरीका
यह ट्रेन यूरोप के कई ऐतिहासिक शहरों से होकर गुजरती है—पेरिस, वेनिस, वियना, प्राग जैसे शहर। खिड़की से दिखते पहाड़, झीलें, खेत और पुराने कस्बे—सब कुछ स्लो मोशन में, ताकि आप देख सको, महसूस कर सको।
💰 प्रति व्यक्ति खर्च: शान की कीमत
अब सच बोलते हैं—यह सफ़र सस्ता नहीं है।
प्रति व्यक्ति अनुमानित लागत: ₹3 लाख से ₹8 लाख या उससे भी अधिक
कीमत निर्भर करती है: रूट, केबिन टाइप, यात्रा की अवधि और सीज़न पर
हाँ, यह महंगा है। लेकिन यह टिकट नहीं, एक लाइफटाइम एक्सपीरियंस है।
🕰️ क्यों खास है यह ट्रेन?
क्योंकि आज की दुनिया तेज़ है, शोर से भरी है। और यह ट्रेन आपको सिखाती है कि धीरे चलना भी एक लक्ज़री है। यहाँ वाई-फाई से ज़्यादा अहमियत बातचीत की है, और जल्दबाज़ी से ज़्यादा अहमियत एहसास की।
📸 सोशल मीडिया नहीं, सोल मीडिया
यह ट्रेन इंस्टाग्राम के लिए नहीं बनी—यह आत्मा के लिए बनी है। यहाँ क्लिक से ज़्यादा ज़रूरी है देखना, स्टोरी से ज़्यादा ज़रूरी है याद बनाना।

🧳 कौन करे यह सफ़र?
जिन्हें इतिहास पसंद है
जिन्हें लक्ज़री दिखावा नहीं, संस्कार लगती है
जिन्हें सफ़र मंज़िल से ज़्यादा प्यारा है
✨ आख़िरी बात
यह ट्रेन हमें याद दिलाती है कि कभी सफ़र भी एक रस्म हुआ करता था। कपड़े बदले जाते थे, डिनर के लिए तैयार हुआ जाता था, और ट्रेन में चढ़ना एक इवेंट होता था।
आज की दुनिया में, जहाँ सब कुछ फ़ास्ट-फ़ॉरवर्ड पर है—यह ट्रेन रीवाइंड बटन है।
और सच कहें तो—
ऐसी लक्ज़री अब बनती नहीं, बस ज़िंदा रखी जाती है।
Note: Content and images are for informational use only. For any concerns, contact us at info@rajasthaninews.com.
देखिए सुष्मिता सेन...
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