पाकिस्तान बॉर्डर पर सबसे बड़ी सैन्य तैनाती | आर्मी चीफ के सवाल पर क्या बोले PM?
- bypari rathore
- 09 February, 2026
क्या आदेश है? पाकिस्तान बॉर्डर पर सबसे बड़ी तैनाती और आर्मी चीफ का सवाल
इन दिनों एक अप्रकाशित किताब को लेकर राजनीतिक और रणनीतिक हलकों में चर्चा तेज है। दावा किया जा रहा है कि मौजूदा दौर में आर्मी चीफ ने सरकार से चीनी टैंकों और सीमा पर सैन्य तैयारियों को लेकर सीधा सवाल पूछा।
यह सुनकर कई लोगों को दो दशक पुराना एक बड़ा घटनाक्रम याद आ गया — जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे और सेना प्रमुख जनरल एस. पद्मनाभन।
📌 जब संसद हमला बना टर्निंग पॉइंट
दिसंबर 2001 में संसद पर हुए आतंकी हमले के बाद भारत की सुरक्षा नीति ने अचानक रफ्तार पकड़ ली। यह सिर्फ एक आतंकी घटना नहीं थी, बल्कि सीधे राष्ट्र की संप्रभुता पर हमला माना गया।
इसके बाद जो हुआ, वह भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे बड़े मूवमेंट्स में से एक था।
👉 पाकिस्तान से लगी सीमा पर हजारों सैनिक, टैंक और तोपें आगे बढ़ा दी गईं।
👉 एयरबेस हाई अलर्ट पर चले गए।
👉 नौसेना तक को स्टैंडबाय पर रखा गया।
यह तैनाती इतनी बड़ी थी कि इसे एक अघोषित युद्ध जैसी स्थिति कहा गया।
🎖️ आर्मी चीफ का सवाल: “आदेश क्या है?”
कहा जाता है कि उस वक्त सेना पूरी तरह तैयार थी, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही था —
“क्या हमें आगे बढ़ना है?”
जनरल एस. पद्मनाभन ने राजनीतिक नेतृत्व से साफ पूछा:
👉 क्या यह सिर्फ दबाव बनाने की रणनीति है या वास्तविक सैन्य कार्रवाई की तैयारी?
सेना के लिए यह फर्क बेहद अहम था, क्योंकि
दबाव की रणनीति में सीमित मूवमेंट होता है
जबकि युद्ध की स्थिति में पूरी योजना अलग होती है
🏛️ प्रधानमंत्री वाजपेयी का जवाब
अटल बिहारी वाजपेयी का जवाब आज भी रणनीतिक सोच का उदाहरण माना जाता है।
उन्होंने न तो जल्दबाज़ी दिखाई और न ही कमजोरी।
सरकार का संदेश साफ था:
✔️ सेना पूरी तरह तैयार रहे
✔️ अंतरराष्ट्रीय दबाव को भी ध्यान में रखा जाए
✔️ फैसला सही समय पर लिया जाएगा
यानी तैनाती खुद में एक संदेश थी — दुश्मन के लिए भी और दुनिया के लिए भी।
📖 आज की किताब, कल की यादें
आज जिस अप्रकाशित किताब की चर्चा हो रही है, उसमें दावा है कि
चीन की सैन्य गतिविधियों
आधुनिक टैंकों
और दो-फ्रंट चुनौती
को लेकर सेना ने सरकार से स्पष्टता मांगी है।
यह सवाल नया नहीं है, लेकिन हालात अलग हैं।
अब भारत को सिर्फ पश्चिम नहीं, उत्तर और पूर्व की सीमाओं पर भी सतर्क रहना है।
🔍 क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
फर्क बस इतना है कि
तब खतरा एक सीमा से था
आज रणनीतिक दबाव कई दिशाओं से है
लेकिन एक चीज़ समान है —
👉 सेना की तैयारी और राजनीतिक निर्णय के बीच संतुलन
यही संतुलन किसी भी बड़े टकराव को रोक भी सकता है और जीत भी दिला सकता है।
📝 निष्कर्ष
पाकिस्तान बॉर्डर पर उस दौर की तैनाती सिर्फ सैनिकों की मूवमेंट नहीं थी, बल्कि रणनीतिक संदेश थी।
आज जब फिर ऐसे सवाल उठ रहे हैं, तो यह साफ है कि
भारत की सुरक्षा नीति में सेना की राय और राजनीतिक नेतृत्व का फैसला — दोनों निर्णायक हैं।
इतिहास बताता है:
👉 कभी-कभी युद्ध लड़े बिना ही जीत लिया जाता है।
Note: Content and images are for informational use only. For any concerns, contact us at info@rajasthaninews.com.
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