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63 साल पहले लता मंगेशकर ने गाया था भोजपुरी का रोमांटिक गीत, मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे बोल

63 साल पहले लता मंगेशकर ने गाया था भोजपुरी का रोमांटिक गीत, मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे बोल

63 साल पहले लता मंगेशकर ने गाया था भोजपुरी का रोमांटिक गीत, मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे बोल

भारतीय संगीत की दुनिया में लता मंगेशकर का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। हिंदी सिनेमा में अपनी सुरीली आवाज से दशकों तक लोगों के दिलों पर राज करने वाली लता मंगेशकर ने कई भारतीय भाषाओं में भी गीत गाए। इन्हीं में भोजपुरी भाषा के कुछ ऐसे गीत भी शामिल हैं, जिन्हें आज भी पुराने संगीत के चाहने वाले याद करते हैं।

करीब छह दशक से ज्यादा पुराने एक भोजपुरी रोमांटिक गीत की चर्चा एक बार फिर हो रही है। खास बात यह है कि इस गीत को लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी थी, जबकि इसके बोल उस दौर के मशहूर गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे।

भोजपुरी सिनेमा के दौर में लता की आवाज

यह गीत भोजपुरी फिल्म ‘लागी नाहीं छूटे रामा’ से जुड़ा है। फिल्म के संगीत में उस दौर की खास मिठास और पारंपरिक भोजपुरी अंदाज देखने को मिलता है। लता मंगेशकर की आवाज ने इस गीत को अलग पहचान दी।

इस गीत की खासियत यह भी थी कि इसमें भोजपुरी भाषा की सहजता के साथ रोमांटिक भावनाओं को खूबसूरती से पेश किया गया था। यही वजह है कि पुराने दौर का यह गीत आज भी संगीत प्रेमियों के बीच चर्चा में आ जाता है।

मजरूह सुल्तानपुरी की कलम का कमाल

गीत के बोल मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे। मजरूह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के उन दिग्गज गीतकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने कई पीढ़ियों के संगीत प्रेमियों को यादगार गीत दिए।

उनकी लेखनी की खासियत यह थी कि वे प्रेम, भावनाओं और रिश्तों को बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों में पेश करते थे। भोजपुरी गीत में भी उनकी यही शैली दिखाई देती है।

चित्रगुप्त ने दिया था संगीत

इस गीत के संगीत की जिम्मेदारी मशहूर संगीतकार चित्रगुप्त ने संभाली थी। भोजपुरी सिनेमा के संगीत में चित्रगुप्त का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। उनके संगीत में लोकधुनों और फिल्मी संगीत का खूबसूरत मेल देखने को मिलता था।

लता मंगेशकर की आवाज, मजरूह सुल्तानपुरी के बोल और चित्रगुप्त का संगीत—इन तीन बड़े नामों का साथ इस पुराने गीत को खास बना देता है।

आज भी क्यों याद किया जाता है यह गीत?

पुराने दौर के गीतों की सबसे बड़ी खूबसूरती उनकी सादगी और भावनात्मक जुड़ाव में थी। उस समय गीतों में भारी-भरकम शब्दों के बजाय भावनाओं को सीधे और मधुर अंदाज में पेश किया जाता था।

यही वजह है कि दशकों बीत जाने के बाद भी ऐसे गीत सोशल मीडिया और पुराने संगीत के प्लेटफॉर्म पर दोबारा चर्चा में आ जाते हैं। नई पीढ़ी भी जब इन गीतों को सुनती है तो उन्हें पुराने भारतीय सिनेमा और संगीत की एक अलग दुनिया की झलक मिलती है।

लता मंगेशकर की बहुभाषी विरासत

लता मंगेशकर ने अपने लंबे संगीत करियर में सिर्फ हिंदी ही नहीं, बल्कि कई भारतीय भाषाओं में गीत गाए। भोजपुरी में उनके गीतों की संख्या भले ही सीमित रही हो, लेकिन इन गीतों ने उनकी बहुमुखी प्रतिभा को जरूर दिखाया।

उनकी आवाज का जादू भाषा की सीमाओं से परे था। यही कारण है कि आज भी उनके पुराने गीत अलग-अलग भाषाओं के संगीत प्रेमियों के बीच सुने और याद किए जाते हैं।

पुराना गीत, नई पीढ़ी में फिर चर्चा

आज जब पुराने हिंदी और क्षेत्रीय गीत सोशल मीडिया के जरिए दोबारा लोगों तक पहुंच रहे हैं, ऐसे में लता मंगेशकर का यह भोजपुरी गीत भी लोगों का ध्यान खींच रहा है। करीब 63 साल पुराने इस गीत से जुड़ी कहानी यह बताती है कि भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में भाषा और संगीत के स्तर पर कितने खूबसूरत प्रयोग किए जाते थे।

लता मंगेशकर की आवाज, मजरूह सुल्तानपुरी की लेखनी और चित्रगुप्त का संगीत इस गीत को भोजपुरी सिनेमा के पुराने दौर की एक यादगार विरासत बनाते हैं।


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