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भारत और कनाडा फिर से FTA वार्ता पर सहमत: गोयल ने भरोसे और रणनीतिक लक्ष्य स्पष्ट किए

भारत और कनाडा फिर से FTA वार्ता पर सहमत: गोयल ने भरोसे और रणनीतिक लक्ष्य स्पष्ट किए

भारत और कनाडा ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण मोड़ लिया है — व्यापार-क्षेत्र में उनकी पुरानी चुहल को तोड़ते हुए दोनों देशों ने मुक्त व्यापार समझौता (FTA) वार्ताओं को फिर से शुरू करने का फैसला किया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के बयान ने एक नई ऊर्जा को जन्म दिया है, और आर्थिक पटल पर यह कदम दोनों साझेदार देशों के लिए सिर्फ एक व्यापारिक सौदा नहीं, बल्कि रणनीतिक भरोसे और दीर्घकालीन सहयोग की दिशा में एक बड़ा संकेत है।

पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारत और कनाडा के बीच व्यापार संबंध लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद ऐसा समझौता जिसे ‘उच्च महत्वाकांक्षा’ वाला कहा जाए — यानी पूरी तरह संरचित, गहरी आर्थिक साझेदारी — अभी तक अधूरा रहा है। कुछ दौरों में वे FTA या CEPA (Comprehensive Economic Partnership Agreement, व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता) की बात कर चुके हैं, लेकिन राजनीतिक और कूटनीतिक उतार-चढ़ाव की वजह से यह रुक-चुका भी है।

समय-समय पर दोनों देशों के बीच तनाव रहा है, जिसने व्यापार वार्ताओं को प्रभावित किया। लेकिन अब, गोयल की हालिया घोषणा ने यह दर्शाया है कि दोनों पक्षों में फिर से भरोसा लौट रहा है और वे एक मज़बूत आर्थिक साझेदारी की ओर अग्रसर हैं।

गोयल का बयान और उनकी रणनीति

पीयूष गोयल ने स्पष्ट कहा है कि “हमने सहमति जताई है कि हाई-एम्बिशन CEPA वार्ताएं शुरू की जाएँ।” Business Standard+1 उन्होंने यह जोड़ते हुए कहा कि यह सिर्फ व्यापार-समझौता नहीं है, बल्कि दो देशों के बीच भरोसे का प्रतीक है।

गोयल ने यह भी कहा कि भारत और कनाडा की ताकत गठबंधन के रूप में काम कर सकती है — दोनों देशों के संसाधन, टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और निवेश-क्षमता को मिलाकर वे व्यवसायों और निवेशकों को “फोर्स मल्टीप्लायर” दे सकते हैं। 

उनकी दृष्टि सिर्फ पारंपरिक व्यापार तक सीमित नहीं है — गोयल ने महत्वपूर्ण खनिजों, खनिजों की प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों, और परमाणु ऊर्जा विशेष रूप से यूरेनियम आपूर्ति को भी भविष्य में एक कोर सहयोग क्षेत्र बताया है। यह क्षेत्र न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि रणनीतिक रूप से भी दोनों देशों के लिए फायदेमंद हो सकता है।

एक और अहम बिंदु — गोयल ने सप्लाई चेन की विविधता की बात उठाई है। उन्होंने कहा है कि दोनों देशों की आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाकर वे व्यापार और निवेश जोखिम को कम कर सकते हैं और प्रणालीगत सुरक्षा बढ़ा सकते हैं। 

लक्ष्य: 2030 तक 50 बिलियन डॉलर

गोयल ने यह लक्ष्य साफ किया है — दोनों देश मिलकर 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 बिलियन डॉलर तक ले जाना चाहते हैं। यह लक्ष्य महत्वाकांक्षी है, लेकिन अगर इसे हासिल किया जाए, तो यह न केवल भारत और कनाडा के आर्थिक संबंधों को एक नई ऊँचाई पर ले जाएगा, बल्कि वैश्विक आर्थिक मानचित्र पर उनकी साझेदारी को एक ठोस पहचान भी देगा।

यह लक्ष्य इस मायने में रणनीतिक है क्योंकि यह सिर्फ व्यापार वृद्धि नहीं दर्शाता, बल्कि यह एक दीर्घकालीन आर्थिक साझेदारी की प्रतिबद्धता है। यदि यह लक्ष्य प्राप्त होता है, तो यह दोनों देशों के निवेशकों, उद्यमियों और उद्योगों के लिए एक मजबूत भरोसेमंद प्लेटफार्म साबित हो सकता है।

क्यों यह कदम मायने रखता है?

यह पुनरारंभ सिर्फ एक व्यापारिक बात नहीं — यह राजनयिक, आर्थिक और रणनीतिक तीनों स्तरों पर महत्व रखता है:

राजनयिक सुधार: पिछले कुछ वर्षों में भारत-कनाडा रिश्तों में तनाव रहा है। गोयल की इस घोषणा से यह संकेत मिलता है कि दोनों देश न केवल आर्थिक बल्कि राजनयिक मोर्चे पर भी दूरी को पाटने को तैयार हैं।

आर्थिक अवसर: उच्च महत्वाकांक्षा वाला CEPA दोनों देशों को नया आर्थिक मॉडल दे सकता है — जहाँ सिर्फ माल का आयात-निर्यात नहीं, बल्कि सेवा, निवेश, टेक्नोलॉजी और जिम्मेदार आपूर्ति श्रृंखलाओं पर ध्यान हो।

रणनीतिक सुरक्षा: यूरेनियम और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में सहयोग, दोनों देशों की ऊर्जा सुरक्षा और उद्योग संरचना को मज़बूत कर सकता है। साथ ही, सप्लाई चेन की विविधता वैश्विक आर्थिक झटकों के समय में सुरक्षा प्रदान करती है।

निवेशक विश्वास: एक सशक्त FTA / CEPA से न केवल व्यापार बल्कि निवेश भी बढ़ सकता है। इससे दोनों देशों के निवेशकों को दीर्घकालीन दृष्टि के साथ काम करने का भरोसा मिलेगा।

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चुनौतियाँ और जोखिम

हालाँकि यह घोषणा उम्मीद जगाती है, पर राह आसान नहीं होगी। कुछ चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं:

नीतिगत और संवेदनशील मुद्दे: कुछ क्षेत्रों में कट-छाँट, टैरिफ में कमी, नियमों में सहमति और विवाद-निपटान तंत्र पर सहमति बनाना मुश्किल हो सकता है।

राजनीतिक अस्थिरता: दोनों देशों में आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक क्लाइमेट बदलते रहते हैं। अगर राजनीतिक समर्थन कमजोर पड़ जाए, तो वार्ता धीमी पड़ी सकती है।

आपूर्ति श्रृंखला जोखिम: सप्लाई चेन को विविधता देना एक रणनीतिक कदम है, लेकिन उस संदर्भ में नए निवेश, लॉजिस्टिक्स और टेक्नोलॉजी को ठीक से तैयार करना होगा।

विनियामक बाधाएँ: दोनों देशों के नियामक ढाँचे अलग-अलग हैं, और FTA में सेवा क्षेत्र, निवेश और अन्य संवेदनशील हिस्सों में सहमति के लिए कठिन वार्ता हो सकती है।

संभावित सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

अगर यह FTA / CEPA सफल रहा, तो इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी गहरे होंगे:

निर्यातकों के लिए अवसर: भारतीय निर्यातकों को कनाडा में बेहतर पहुंच मिलेगी, और कनाडाई कंपनियों को भारत में निवेश का मौका मिलेगा।

नौकरी सृजन: व्यापार और निवेश के विस्तार से दोनों देशों में नए उद्योग खड़े हो सकते हैं, जिससे नौकरी के नए अवसर बनेंगे।

तकनीकी सहयोग: खनिज प्रसंस्करण, एनर्जी, इनोवेशन जैसे क्षेत्रों में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और जोखिम-साझेदारी हो सकती है।

शिक्षा-संस्कृति जुड़ाव: आर्थिक भागीदारी अक्सर शिक्षा, रिसर्च, स्टार्टअप्स और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी बढ़ावा देती है, जिससे दोनों देशों के नागरिकों के बीच संपर्क गहरे होंगे।

विदेशी नीति और रणनीति दृष्टिकोण

यह कदम भारत की अधिक व्यापक विदेशी आर्थिक नीति में फिट बैठता है, जहाँ वह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि दीर्घकालीन, भरोसेमंद साझेदारी की ओर देख रहा है। भारत, अपनी वैश्विक भूमिका को मजबूत करने के लिए अलग-अलग पार्टनरशिप पर काम कर रहा है — CEPA वार्ता इसी रणनीति का हिस्सा है।

कनाडा के लिए भी यह महत्वपूर्ण है: भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ मजबूत आर्थिक समझौता उन्हें रणनीतिक सहयोग, बाजार एक्सपांसन और संसाधन सुरक्षा दोनों में लाभ दे सकता है।

निष्कर्ष

भारत और कनाडा का FTA (या CEPA) फिर से शुरू करने का फैसला एक बड़ा, महत्वाकांक्षी कदम है। पीयूष गोयल की प्रतिबद्धता और उनकी स्पष्ट रणनीति यह दिखाती है कि भारत इस समझौते को सिर्फ व्यापार के दृष्टिकोण से नहीं देखता, बल्कि इसे एक रणनीतिक साझेदारी के रूप में ले रहा है।

अगर सब कुछ योजना के मुताबिक आगे बढ़ता है, और 2030 तक 50 बिलियन डॉलर का लक्ष्य हासिल होता है, तो यह सिर्फ आर्थिक बढ़ोतरी का मापदंड नहीं होगा — यह दोनों देशों के बीच भरोसे और साझा भविष्य का प्रतीक बनेगा।

यह समझौता दोनों देशों के लिए नए युग की शुरुआत हो सकती है — जहाँ व्यापार, निवेश, टेक्नोलॉजी, ऊर्जा और सप्लाई चेन में एक सामंजस्यपूर्ण, दीर्घकालीन साझेदारी को बल मिलेगा।


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