रील्स पर छाई सदियों पुरानी धुन! ‘मोहे प्रीत की रीत न भाई सखी’ के पीछे छिपी है दिलचस्प कहानी
- bySanjay
- 13 September, 2026
रील्स पर फिर छाई सदियों पुरानी धुन, ‘मोहे प्रीत की रीत न भाई सखी’ ने मचाई धूम; जानिए इस गीत का इतिहास
इन दिनों अगर आप सोशल मीडिया पर लगातार Reels और शॉर्ट वीडियो देख रहे हैं, तो एक पुरानी-सी मधुर धुन आपके कानों तक जरूर पहुंची होगी। “मोहे प्रीत की रीत न भाई सखी…” के बोल वाली यह रचना अचानक सोशल मीडिया पर खूब इस्तेमाल की जा रही है। लोग इस धुन पर अपनी तस्वीरें, वीडियो, शादी के पल, भावुक कहानियां और अलग-अलग तरह के शॉर्ट वीडियो बना रहे हैं।
खास बात यह है कि जिस धुन को आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया के ट्रेंड के रूप में सुन रही है, उसके पीछे भारतीय उपमहाद्वीप की पुरानी संगीत और काव्य परंपरा से जुड़ी कहानी बताई जाती है। उपलब्ध साहित्यिक स्रोत इस रचना को अमीर खुसरो से जोड़ते हैं।
🎵 आखिर कौन-सी है यह रचना?
यह रचना “जो मैं जानती बिसरत हैं सैयाँ” के नाम से भी दर्ज है। इसमें विरह और प्रेम की भावनाओं को व्यक्त किया गया है। “मोहे प्रीत की रीत न भाई सखी…” वाली पंक्ति इसी रचना का हिस्सा है। साहित्यिक स्रोतों में इसे अमीर खुसरो की रचनाओं के साथ प्रस्तुत किया गया है।
आज सोशल मीडिया पर इसका इस्तेमाल जिस तरह हो रहा है, उससे इस पुराने काव्य की नई पीढ़ी तक पहुंच फिर से बढ़ गई है।
📱 Reels ने पुराने गीत को दी नई पहचान
सोशल मीडिया की खासियत ही यही है कि कोई पुरानी धुन या गीत अचानक किसी नए वीडियो के साथ वायरल हो जाता है। इस मामले में भी यही देखने को मिल रहा है।
लोग इस धुन को भावुक और पारंपरिक वीडियो से जोड़ रहे हैं। इसकी आवाज और शब्दों में मौजूद पुराना अंदाज इसे आज के सामान्य ट्रेंडिंग ऑडियो से अलग बनाता है।
कई यूजर्स के लिए यह सिर्फ एक वायरल ऑडियो है, लेकिन जब इसके इतिहास की जानकारी सामने आती है तो इसकी कहानी और भी दिलचस्प हो जाती है।
🕰️ सदियों पुरानी बताई जाती है रचना
इस गीत को कई रिपोर्टों में करीब 700 साल पुरानी रचना बताया गया है। हालांकि किसी भी ऐतिहासिक रचना की सटीक तारीख तय करना हमेशा आसान नहीं होता, इसलिए इसे “करीब सात सदियों पुरानी बताई जाने वाली रचना” कहना ज्यादा सावधानीपूर्ण है।
अमीर खुसरो का नाम भारतीय संगीत और साहित्य के इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। उनकी रचनाओं को लेकर लोक-स्मृति और साहित्यिक परंपरा में लंबे समय से चर्चा होती रही है।
❤️ प्रेम और विरह की भावनाएं हैं केंद्र में
इस रचना की सबसे खास बात इसका भाव पक्ष है। इसमें प्रेम के साथ जुड़ी पीड़ा और पछतावे की भावना दिखाई देती है। यही वजह हो सकती है कि सदियों बाद भी इसके शब्द आज के दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ रहे हैं।
आज की तेज रफ्तार सोशल मीडिया दुनिया में जहां कुछ सेकंड के ऑडियो क्लिप ही वायरल होते हैं, वहीं इस तरह की पुरानी रचनाओं का दोबारा लोकप्रिय होना भारतीय संगीत और काव्य की लंबी विरासत को भी सामने लाता है।
🎶 पुरानी रचनाएं, नया डिजिटल दौर
यह पहली बार नहीं है जब सोशल मीडिया ने किसी पुरानी रचना को नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय बनाया हो। Instagram Reels, YouTube Shorts और दूसरे शॉर्ट-वीडियो फॉर्मेट के कारण पुराने भजन, लोकगीत, कव्वाली और शास्त्रीय धुनें नए अंदाज में सामने आती रहती हैं।
‘मोहे प्रीत की रीत न भाई सखी’ भी इसी ट्रेंड का हिस्सा बनती दिखाई दे रही है। एक तरफ युवा इसे नए वीडियो के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ संगीत और साहित्य में रुचि रखने वाले लोग इसके पुराने संदर्भ को तलाश रहे हैं।
🔎 वायरल होने के पीछे क्या है वजह?
इस धुन के वायरल होने की एक बड़ी वजह इसकी भावुक और तुरंत याद रह जाने वाली धुन मानी जा सकती है। सोशल मीडिया पर ऐसे ऑडियो तेजी से फैलते हैं जिन्हें लोग अपनी कहानी या भावनाओं के साथ आसानी से जोड़ सकें।
पुरानी भाषा, पारंपरिक आवाज और भावुक संगीत का मेल इसे आधुनिक वायरल ऑडियो से अलग पहचान देता है।
🌟 सोशल मीडिया ने फिर जगाई इतिहास में दिलचस्पी
इस वायरल ट्रेंड का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि लोगों का ध्यान सिर्फ धुन तक सीमित नहीं रहा। अब लोग यह भी जानना चाहते हैं कि आखिर यह रचना किसकी है, कितनी पुरानी है और इसका मूल संदर्भ क्या है।
यानी कुछ सेकंड की एक वायरल Reel ने लोगों को भारतीय साहित्य, संगीत और इतिहास की ओर दोबारा देखने का मौका दिया है।
कुल मिलाकर, “मोहे प्रीत की रीत न भाई सखी…” आज सोशल मीडिया पर एक ट्रेंडिंग धुन के रूप में सुनाई दे रही है, लेकिन इसके पीछे सदियों पुरानी साहित्यिक परंपरा से जुड़ी कहानी है। उपलब्ध साहित्यिक स्रोत इसे अमीर खुसरो की रचना “जो मैं जानती बिसरत हैं सैयाँ” से जोड़ते हैं।
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