8 अगस्त 1947: जोधपुर को पाकिस्तान में शामिल करना चाहते थे जिन्ना, फिर ऐसे बदला पूरा खेल
- bypari rathore
- 09 August, 2026
8 अगस्त 1947: जब जिन्ना ने जोधपुर को पाकिस्तान में लाने की कोशिश की, फिर ऐसे बदला पूरा घटनाक्रम
नई दिल्ली: भारत की आजादी से ठीक पहले 1947 में रियासतों के भारत या पाकिस्तान में विलय को लेकर कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए थे। इन्हीं में जोधपुर रियासत का मामला भी काफी दिलचस्प था। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह को अपने पक्ष में करने की कोशिश की थी।
8 अगस्त 1947 को जोधपुर के प्रधानमंत्री वी. वेंकटाचारी ने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन को जोधपुर के महाराजा और जिन्ना के बीच हुई मुलाकात के बारे में पत्र लिखा था। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक, जिन्ना की ओर से जोधपुर को कराची बंदरगाह तक पहुंच, जोधपुर-सिंध रेलवे से जुड़े अधिकार और अनाज की आपूर्ति जैसे प्रस्तावों की चर्चा हुई थी।
जोधपुर को लेकर क्यों थी इतनी अहमियत?
जोधपुर की भौगोलिक स्थिति पाकिस्तान के करीब थी और सिंध के साथ उसके व्यापारिक व परिवहन संबंध भी महत्वपूर्ण थे। ऐसे में पाकिस्तान के लिए जोधपुर का साथ रणनीतिक रूप से काफी उपयोगी हो सकता था।
दूसरी ओर, भारत के लिए भी राजस्थान की रियासतों का एकीकरण राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण था। रियासतों के भारत में विलय की प्रक्रिया में सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन की अहम भूमिका रही। मेनन राज्यों के भारत में विलय की नीति तैयार करने और विभिन्न रियासतों से बातचीत करने में महत्वपूर्ण अधिकारी थे।
8 अगस्त को माउंटबेटन ने महाराजा को बुलाया
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, जिन्ना से मुलाकात की जानकारी मिलने के बाद माउंटबेटन ने महाराजा हनवंत सिंह को तुरंत मिलने के लिए बुलाया। महाराजा उसी दिन दिल्ली लौटे और अगले दिन माउंटबेटन से मुलाकात की।
इसके बाद जोधपुर के भारत में विलय की प्रक्रिया आगे बढ़ी और अंततः रियासत ने भारत के साथ जाने का फैसला किया।
उसी समय गांधी हिंसा से थे चिंतित
आजादी से कुछ दिन पहले देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा और विस्थापन का दर्द गहरा था। गांधी 8 अगस्त 1947 को पटना में थे। गांधी स्मृति के रिकॉर्ड के अनुसार, उस दिन उन्होंने 15 अगस्त को जश्न के बजाय उपवास, चरखा और प्रार्थना के साथ मनाने की बात कही थी।
इस तरह 8 अगस्त 1947 का समय भारतीय इतिहास में बेहद उथल-पुथल भरा था—एक ओर देश आजादी की दहलीज पर खड़ा था, वहीं दूसरी ओर रियासतों के भविष्य और विभाजन से पैदा हुई हिंसा ने नई चुनौतियां खड़ी कर दी थीं।
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