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सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों की बहस: “कुत्ते का मूड कौन जाने?”, “strays raped” तक पहुँचा तर्क

सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों की बहस: “कुत्ते का मूड कौन जाने?”, “strays raped” तक पहुँचा तर्क

1. शुरुआत: मामला क्या है?

2025 के बाद से भारत में आवारा कुत्तों (stray dogs) को लेकर बहस लगातार तेज़ होती जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई‑अगस्त 2025 में आदेश जारी किया था कि सार्वजनिक इलाक़ों जैसे स्कूल, अस्पताल, रेलवे स्टेशन, कोर्ट परिसर आदि से आवारा कुत्तों को हटाया जाए, उन्हें नसबंदी और टीकाकरण के बाद निर्दिष्ट शेल्टर में रखा जा सके, और ज़रूरत पड़े तो इन्हें फिर से वही छोड़ने से रोक दिया जाए।

लेकिन इसके बाद से यही आदेश देश भर में एक बड़े विवाद में बदल गया — क्योंकि बहुत से पशु प्रेमी, वकील, और सामाजिक संगठन इसे अमानवीय और वैज्ञानिक दृष्टि से गलत बता रहे हैं। इस विवाद का केंद्र अब सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुँचा है। 

2. सुप्रीम कोर्ट में बहस की शुरुआत

जनवरी 7, 2026 को सुप्रीम कोर्ट की तीन‑जज बेंच (जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता, और जस्टिस एन.वी. अंजारिया हैं) ने इस मामले की सुनवाई करते हुए अलग‑अलग पक्षों की दलीलों को सुना। मुख्य रूप से यह बहस सार्वजनिक सुरक्षा बनाम पशु कल्याण के बीच टकराव रही।

सुनवाई की शुरुआत में कोर्ट ने पूछा कि अगर कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों पर रहने देना माना जा रहा है, तो उनके व्यवहार को कौन कैसे समझेगा? क्या हम हर कुत्ते के मूड को जान सकते हैं — यह बहुत बड़ा सवाल है, क्योंकि किसी भी आम इंसान के लिए यह समझना संभव नहीं है कि वह कुत्ता कब काटेगा, कब शांत रहेगा, कब दुर्घटना का कारण बनेगा। 

3. सुप्रीम कोर्ट का प्रमुख बयान: “कुत्ते का मूड कोई नहीं जान सकता”

जस्टिस विक्रम नाथ ने सुनवाई के दौरान कहा —

“किस कुत्ते का मूड सुबह कैसा है — कोई नहीं जान सकता। न केवल काटने की बात है, बल्कि सड़क पर दुर्घटना का खतरा भी है।” 

इस बयान ने कोर्ट की मुख्य चिंता को साफ़ कर दिया: यह सिर्फ़ कुत्तों की भावनाओं या जीवन की बात नहीं है — यह लोक सुरक्षा, लोगों की रोज़मर्रा ज़िंदगी, बच्चों की सुरक्षा, और दुर्घटना‑नियंत्रण का मामला भी है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह किसी नए कानून का निर्माण नहीं कर रही, बल्कि पहले से मौजूद नियमों के कड़ाई से पालन की बात कर रही है।

4. वकीलों का पक्ष: Humane treatment और coexistence

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिबल ने अदालत को बताया कि जानवरों के प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए। उनका तर्क था —

“अगर हम पशुओं को सम्मान और सहानुभूति से देखें, तो वे हमला नहीं करेंगे।” 

सिबल ने कहा कि अनुचित रूप से उन्हें परेशान करना, उनका स्थान न देना, या उन्हें भड़काना ही उनके व्यवहार को उग्र बनाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि अगर कोई आवारा कुत्ता मुश्किल भरा व्यवहार दिखाता है, उसे पकड़कर नसबंदी और टीकाकरण के बाद उसी क्षेत्र में वापस छोड़ा जा सकता है — ताकि इंसान और जानवर के बीच सह-अस्तित्व संभव हो सके। 

5. “Strays raped” जैसे बयान: विवादित तर्क भी सामने आए

बहस के दौरान दूसरे पक्ष के वकील ने कुछ ऐसे तर्क भी पेश किए जिन्हें लोगों ने काफी विवादित माना। लाइव लॉ (LiveLaw) के हवाले से कहा गया कि —

“कुत्तों के साथ दुर्व्यवहार, कुत्तों के साथ असभ्य कृत्य…” जैसे शब्द इस्तेमाल किए गए। 

कुल मिलाकर यह बहस सड़क पर कुत्तों की स्थिति के अलावा मानव‑पशु संबंधों की जटिलता तक जा पहुँची थी, और कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को गंभीरता से सुना।

6. सार्वजनिक सुरक्षा बनाम पशु अधिकार: जहां बहस टकराई

कोर्ट ने इस बात पर बल दिया कि सिर्फ कुत्तों के नुकसान या सुरक्षा को देखना पर्याप्त नहीं है — सड़क पर दुर्घटनाएँ, बच्चों पर हमले, अस्पताल या स्कूल परिसर में जोखिम जैसी चीज़ें भी समाज के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। 

जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि —

“संस्थानिक क्षेत्रों में कुत्तों का होना कथित खतरा है, और हम यह बहस क्यों कर रहे हैं?” 

यह बात साफ़ दर्शाती है कि कोर्ट प्राथमिकता के रूप में लोक सुरक्षा को आगे रख रही है, न कि केवल उद्धारवाद या पशु प्रेम‑वृत्ति को। 

7. आदेश की पृष्ठभूमि और पालन की स्थिति

यह सुनवाई एक बुनियादी सवाल पर भी केंद्रित रही: पहले आदेश — कुत्तों को विद्यालयों, अस्पतालों, कोर्ट परिसर आदि से हटाया जाए — क्या पालन हो रहा है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने कई राज्यों को ABC नियमों के पालन और रिपोर्ट दाखिल करने के लिए आदेश दिए थे लेकिन कई राज्यों ने इसे नजरअंदाज़ भी किया। 

राजस्थान जैसे राज्यों ने अदालत को बताया कि वहाँ 58,000 से अधिक कुत्तों को पकड़ा गया और 52,000 का नसबंदी किया गया — ये आंकड़े राज्य प्रशासन की प्रतिक्रिया को दर्शाते हैं। 

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8. क्या कोर्ट ने कुत्तों को पूरी तरह सड़क से हटाने का आदेश दिया?

नहीं। जनवरी 2026 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सड़क पर मौजूद कुत्तों पर आदेश केवल संस्थागत क्षेत्रों से हटाने तक सीमित है, न कि सार्वजनिक सड़कों पर पूर्ण निर्वासन। 

कोर्ट ने यह भी कहा कि कुत्तों का नियंत्रण करना ज़रूरी है, लेकिन नसबंदी, टीकाकरण, और उपयुक्त शेल्टर व्यवस्था के साथ। 

9. सामाजिक प्रतिक्रिया: समर्थन और विरोध दोनों

देश भर में डॉग लवर्स, पशु अधिकार संगठन, और आम जनता ने इस आदेश के बारे में मज़बूत प्रतिक्रिया दी है। कुछ लोगों ने इसे पशु अधिकारों का सम्मान कहा, और कुछ लोग इसे लोकतंत्र में व्यवस्था की आवश्यकता मानते हैं। 

10. सुनवाई आगे जारी: अगला कदम क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 8, 2026 को भी इस मामले पर सुनवाई की अगली तारीख रखी है। यह बहस अभी जारी रहेगी, और दोनों पक्ष अदालत को विस्तार से दलीलें देंगे कि लोक सुरक्षा और पशु कल्याण को कैसे संतुलित किया जाए

निष्कर्ष

अंत में, यह मामला सिर्फ कुत्तों को हटाने का नहीं है — यह मानव‑पशु संबंध के नैतिक, सुरक्षा‑आधारित, और सामाजिक आयामों को भी छू रहा है। सुप्रीम कोर्ट इस सुनवाई में दोनों पक्षों को ध्यान से सुन रही है, और इसका लक्ष्य सिर्फ़ सख्त आदेश देना नहीं, बल्कि सुरक्षित, न्यायसंगत, और मानव‑पशु दोनों के हित में समाधान ढूँढना है।


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