इडली-सांभर की थाली पर चली राजनीति: सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की मुलाकात से कर्नाटक की सियासत में नई गर्मी
- byAman Prajapat
- 29 November, 2025
इडली-सांभर की टेबल पर राजनीति की तपिश—कर्नाटक में क्या पक रहा है?
कर्नाटक की राजनीति वैसे भी किसी मसालेदार दाल की तरह हर हफ्ते उबलती रहती है, लेकिन इस बार मामला थोड़ा ज़्यादा ही गरम हो गया। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की इडली-सांभर ब्रेकफास्ट मीटिंग ने पूरे राज्य के राजनीतिक थर्मामीटर को एक झटके में हाई पर सेट कर दिया है।
राजधानी बेंगलुरु में सवेरे-सवेरे हुई यह मिट्टी-सी सादी, लेकिन राजनीति-सी भारी मुलाकात अब हर न्यूज़ रूम का ताज़ा मसाला बन चुकी है।
सच तो यह है कि जब राजनीति गरम हो जाए, तो बातचीत का सहारा एक गर्म नाश्ता ही देता है—इस धरती ने हमेशा मेल-मिलाप और टकराव, दोनों को खाने की थाली में ही सुलझते देखा है। बुज़ुर्ग कहते भी हैं—“रोटी और राजनीति में भावनाएँ ज़्यादा होती हैं, आकड़े कम।”
और आज की युवा पीढ़ी कह दे—“भाई, ये असली ‘Breakfast Diplomacy’ थी।”
पावर स्ट्रगल: कांग्रेस सरकार के भीतर चल रहा है असली खेल
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार एक साल पूरा कर चुकी है, लेकिन सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की जोड़ी हमेशा थोड़ी खट्टी-मीठी रही है।
दोनों नेताओं की ताक़त, जनता में पकड़ और राजनीतिक कद अपने-अपने क्षेत्रों में मजबूत है, लेकिन सत्ता की कुर्सी केवल एक होती है—और उसी पर असल खेल टिका रहता है।
राजनीतिक हलकों में दो बातें सबसे ज़्यादा चर्चा में हैं —
1️⃣ डीके शिवकुमार की चाहत—CM की गद्दी की ओर अगला कदम?
कहा जाता है कि कांग्रेस आलाकमान ने 2023 में सीएम पोस्ट को लेकर एक “अनौपचारिक रोटेशन फॉर्मूला” बनाया था।
मतलब कुछ साल सिद्धारमैया, फिर कुछ साल डीके शिवकुमार।
लेकिन राजनीति में फॉर्मूला अक्सर कैलकुलेटर नहीं, बल्कि मौके से बदलता है।
डीके शिवकुमार का कद बढ़ा है—वो प्रदेश अध्यक्ष भी हैं, और पार्टी को जिताने में उनका रोल भी बड़ा माना जाता है।
तो जाहिर है, उनकी नज़र भविष्य पर तो होगी ही।
2️⃣ सिद्धारमैया का अनुभव—पुराना पहाड़ आज भी अटल खड़ा है
सिद्धारमैया उन नेताओं में हैं जो राजनीति का मौसम देखकर काम नहीं करते—वे खुद मौसम बदलने की क्षमता रखते हैं।
उनका क्लासिकल राजनीतिक अंदाज़ है—धीरे चलो, पर लंबे चलो।
और ये बात दिल्ली भी जानती है।
इडली-सांभर मीटिंग: क्या हल हुआ? या बस ड्रामा बढ़ गया?
सुबह-सुबह दोनों नेता एक मेज पर बैठे।
प्लेट में इडली। कटोरी में सांभर।
और बगल में राजनीति, जो हमेशा की तरह गर्म।
इस मीटिंग में—
शासन और प्रशासन की शिकायतों पर बात हुई
विभागों को लेकर खटपट पर चर्चा हुई
पार्टी आलाकमान को लेकर भी संकेत दिए गए
2025 के लोकसभा पोस्ट-इलेक्शन समीकरणों पर भी बात मानी जा रही है
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या तनाव कम हुआ?
राजनीति के पुराने सूत्र कहते हैं—
"एक नाश्ता तनाव नहीं मिटाता, पर संवाद का दरवाज़ा खोल देता है।”
और यही हुआ।
तनाव मिटा नहीं—पर मंच तैयार हो गया।
दिल्ली की नज़र—कांग्रेस आलाकमान क्या चाहता है?
कहानी यहीं नहीं रुकती।
दिल्ली में बैठे बड़े नेता इस पूरी नाटक को बहुत ध्यान से देख रहे हैं।
उनकी प्रायोरिटी साफ़ है—
सरकार गिरे नहीं
पार्टी में बगावत न फूटे
भाजपा को मुद्दा न मिले
और विकास का नैरेटिव टूटे नहीं
आलाकमान जानता है कि सिद्धारमैया और डीकेएस दोनों ही बड़े दिग्गज हैं।
एक को नाराज़ करना मतलब राज्य में सियासी भूचाल के दरवाज़े खोलना।
इसलिए दिल्ली चाहती है—दोनों किसी तरह साथ चलें, कम से कम अगले चुनाव तक।
राजनीतिक संदेश: जनता को दिखाना है कि सब ठीक है
मुलाकात का सार्वजनिक चेहरा बहुत सिंपल था—
“दोनों नेता साथ में नाश्ता कर रहे हैं… सब सही है।”
लेकिन राजनीति की भाषा कभी इतनी सीधी नहीं होती।
जब दोनों नेता एक साथ कैमरे में मुस्कुराते दिखे, तो उसका संदेश जनता को नहीं, बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं और विपक्ष को भेजा गया।
जैसे कहना चाह रहे हों—
“हम लड़ सकते हैं, पर टूटेंगे नहीं।”

विपक्ष की आँखों में नई चमक
भाजपा और जेडीएस को जैसे एक नया मौका मिल गया।
वे पहले से ही सरकार को “अंदरूनी कलह” का टैग देने में लगे हुए थे।
बीजेपी नेताओं ने कहा—
“जब मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री ही एक-दूसरे से नहीं बन रही, तो राज्य कैसे चलेगा?”
जेडीएस बोली—
“इडली-सांभर से सरकार नहीं, नीति बनती है।”
राजनीतिक तंज़ तो उड़ते ही रहेंगे—ये लोकतंत्र का पुराना खेल है।
जनता का मूड—लोग कह रहे हैं ‘काम करो, ड्रामा नहीं’
कर्नाटक के युवाओं का साफ़ संदेश है—
“नेतागण जो भी करना है, अंदर कर लो… हमें बिजली, सड़क, रोज़गार, और स्थिर सरकार चाहिए।”
आज की जनता सिर्फ शो-शा पर भरोसा नहीं करती।
उन्हें परफॉर्मेंस चाहिए।
कहानी अभी बाकी है—कर्नाटक राजनीति का अगला अध्याय
यह मीटिंग महज एक शुरुआत है।
आने वाले महीनों में कई फैसले होंगे—
मंत्रिमंडल फेरबदल?
पार्टी पदों का पुनर्वितरण?
सीएम रोटेशन पर नई चर्चा?
फिर से दिल्ली की मध्यस्थी?
कहानी आगे लंबी है और दिलचस्प भी।
सत्ता के गलियारों में हर कदम शतरंज की चाल जैसा होता है।
और कर्नाटक की राजनीति तो ख़ासतौर पर—
“धीमी आँच पर पकती, पर तीखा स्वाद छोड़ती है।”
✔ निष्कर्ष
इडली-सांभर की यह राजनीतिक मुलाकात भले सादी लगे, लेकिन इसके भीतर गहरे संकेत छिपे हैं।
कर्नाटक की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है।
सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की दोस्ती-रंजिश, दोनों ही पार्टी के भविष्य को तय करेगी।
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