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एयर प्यूरीफायर को मेडिकल डिवाइस घोषित करना उल्टा असर डालेगा: दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार का तर्क

एयर प्यूरीफायर को मेडिकल डिवाइस घोषित करना उल्टा असर डालेगा: दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार का तर्क

दिल्ली की हवा कोई नई कहानी नहीं सुना रही—ये वही पुराना दर्द है, जो हर सर्दी में और गहरा हो जाता है। स्मॉग की मोटी चादर, आंखों में जलन, सांसों में भारीपन और अस्पतालों में बढ़ती भीड़। इसी ज़मीन पर खड़ा है एयर प्यूरीफायर का सवाल—और अब ये सवाल पहुंच गया है दिल्ली हाईकोर्ट की चौखट तक।

⚖️ मामला क्या है?

दिल्ली हाईकोर्ट में दायर एक याचिका में मांग की गई कि एयर प्यूरीफायर को “मेडिकल डिवाइस” की श्रेणी में लाया जाए, ताकि इनके निर्माण, बिक्री और गुणवत्ता पर सख्त नियम लागू हो सकें। याचिकाकर्ता का तर्क था कि चूंकि एयर प्यूरीफायर सीधे तौर पर मानव स्वास्थ्य से जुड़ा है, इसलिए इसे चिकित्सा उपकरणों जैसा ही ट्रीट किया जाना चाहिए।

🏛️ केंद्र सरकार का साफ जवाब

केंद्र सरकार ने इस मांग का कड़ा विरोध किया। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि:

एयर प्यूरीफायर इलाज नहीं, बल्कि एक सहायक उपभोक्ता उत्पाद है

इसे मेडिकल डिवाइस घोषित करना अतिरिक्त नियामक बोझ पैदा करेगा

इससे उत्पाद महंगे होंगे और आम लोगों की पहुंच से बाहर चले जाएंगे

प्रदूषण की असली समस्या का समाधान नियम नहीं, बल्कि स्रोत नियंत्रण है

सरकार ने दो टूक कहा कि ऐसा कदम “counter-productive” यानी उल्टा नुकसान करने वाला साबित होगा।

🧠 मेडिकल डिवाइस क्यों नहीं?

केंद्र का तर्क सीधा है—मेडिकल डिवाइस वो होते हैं जो:

किसी बीमारी का निदान (diagnosis) करें

या इलाज (treatment) में सीधे इस्तेमाल हों

जैसे वेंटिलेटर, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर, या इंसुलिन पंप।
एयर प्यूरीफायर इनमें से कुछ भी नहीं करता। ये बस हवा को थोड़ा बेहतर बनाता है—बीमारी ठीक नहीं करता।

💸 आम आदमी पर असर

अगर एयर प्यूरीफायर मेडिकल डिवाइस बन जाता है तो:

लाइसेंसिंग और सर्टिफिकेशन की लागत बढ़ेगी

कंपनियां वो खर्च उपभोक्ताओं पर डालेंगी

8–10 हज़ार वाला प्यूरीफायर 20–25 हज़ार का हो सकता है

और सच कहें तो—दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद जैसे इलाकों में पहले ही सांस लेना महंगा हो चुका है।

🌫️ प्रदूषण की जड़ कहां है?

केंद्र सरकार ने अदालत को याद दिलाया कि:

एयर प्यूरीफायर लक्षण से लड़ता है, बीमारी से नहीं

असली दुश्मन हैं:

पराली जलाना

वाहन प्रदूषण

निर्माण कार्यों की धूल

औद्योगिक उत्सर्जन

जब तक इन पर काबू नहीं, तब तक प्यूरीफायर सिर्फ एक अस्थायी सहारा है।

👩‍⚕️ स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय

कई डॉक्टर भी इस बात से सहमत दिखते हैं कि एयर प्यूरीफायर:

अस्थमा या एलर्जी वाले मरीजों को राहत दे सकता है

लेकिन इसे चिकित्सा उपचार का विकल्प नहीं माना जा सकता

डॉक्टरों के मुताबिक, साफ हवा ज़रूरी है, मगर इलाज का दर्जा देना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं।

Reduce GST on air purifiers to 5 per cent, plea filed before Delhi High  Court - India Today
एयर प्यूरीफायर को मेडिकल डिवाइस घोषित करना उल्टा असर डालेगा: दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार का तर्क

📜 कानून और नियमों की उलझन

अगर एयर प्यूरीफायर मेडिकल डिवाइस बनता है तो:

ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट लागू होगा

CDSCO जैसे संस्थानों की मंजूरी जरूरी होगी

छोटे स्टार्टअप और लोकल मैन्युफैक्चरर बाज़ार से बाहर हो सकते हैं

यानी इनोवेशन पर भी ब्रेक लग सकता है।

🧩 अदालत की भूमिका

दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र के तर्कों को रिकॉर्ड पर लिया है और मामले की सुनवाई जारी है। अदालत इस बात पर विचार कर रही है कि:

स्वास्थ्य सुरक्षा ज़रूरी है

लेकिन ओवर-रेगुलेशन कहीं समस्या को और न बढ़ा दे

🔚 निष्कर्ष

एयर प्यूरीफायर कोई जादुई मशीन नहीं, और न ही कोई मेडिकल चमत्कार। ये बस एक सहारा है—उस सिस्टम की नाकामी का, जो हमें साफ हवा नहीं दे पाया।

केंद्र सरकार का कहना साफ है:
समस्या को जड़ से ठीक करो, पैबंद को दवा मत बनाओ।

और सच बोलें तो—ये बात कड़वी है, मगर गलत नहीं।


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