राजस्थान में टू-चाइल्ड पॉलिसी खत्म: अब 2 से ज्यादा बच्चों वाले भी लड़ सकेंगे चुनाव
- bykrish rathore
- 19 March, 2026
राजस्थान की राजनीति में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला है, जब राज्य विधानसभा ने राजस्थान पंचायती राज (संशोधन) बिल, 2026 को पारित कर दिया। इस संशोधन के साथ ही लगभग 30 साल पुरानी "टू-चाइल्ड पॉलिसी" को समाप्त कर दिया गया है। इस नियम के तहत अब तक उन लोगों को पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से वंचित रखा जाता था, जिनके दो से अधिक बच्चे होते थे।
यह नियम मूल रूप से जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू किया गया था। सरकार का मानना था कि यदि चुनाव लड़ने की पात्रता को बच्चों की संख्या से जोड़ा जाए, तो लोग छोटे परिवार की नीति अपनाने के लिए प्रेरित होंगे। हालांकि, समय के साथ इस नियम को लेकर कई तरह की बहस और आलोचनाएं सामने आईं।
आलोचकों का कहना था कि यह नीति व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। कई मामलों में यह भी देखा गया कि लोगों को चुनाव लड़ने के लिए मजबूरी में अपने बच्चों को छिपाना पड़ा या परिवार से अलग होना पड़ा। इस वजह से यह नियम सामाजिक और नैतिक विवादों का कारण भी बना।
नए संशोधन के बाद अब ऐसे सभी प्रतिबंध हटा दिए गए हैं। इसका मतलब है कि अब कोई भी व्यक्ति, चाहे उसके दो से अधिक बच्चे हों, पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में भाग ले सकता है। यह कदम लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
सरकार का तर्क है कि बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश में ऐसे प्रतिबंध अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं। साथ ही, जनसंख्या नियंत्रण के लिए अब जागरूकता, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक जोर दिया जा रहा है, न कि चुनावी प्रतिबंधों पर।
हालांकि, इस फैसले को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे लोकतंत्र की जीत मान रहे हैं, तो वहीं कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों पर असर पड़ सकता है। उनका कहना है कि पहले यह नियम एक प्रकार का प्रोत्साहन था, जो अब खत्म हो गया है।
राजनीतिक दृष्टिकोण से भी यह फैसला महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे चुनावी मैदान में उम्मीदवारों की संख्या और विविधता बढ़ सकती है। कई ऐसे लोग जो पहले इस नियम के कारण चुनाव नहीं लड़ सकते थे, अब उन्हें मौका मिलेगा।
कुल मिलाकर, राजस्थान सरकार का यह कदम एक बड़े नीतिगत बदलाव का संकेत देता है। यह दर्शाता है कि राज्य अब पारंपरिक नियंत्रण आधारित नीतियों से आगे बढ़कर अधिक उदार और समावेशी दृष्टिकोण अपना रहा है। आने वाले समय में इसका असर न केवल स्थानीय राजनीति बल्कि सामाजिक संरचना पर भी देखने को मिल सकता है।

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