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“नफरत की राजनीति को वैचारिक सुरक्षा कवच दिया जा रहा है” — NSA अजीत डोभाल पर भड़कीं महबूबा मुफ्ती, मुसलमानों के खिलाफ हिंसा सामान्य करने का आरोप

“नफरत की राजनीति को वैचारिक सुरक्षा कवच दिया जा रहा है” — NSA अजीत डोभाल पर भड़कीं महबूबा मुफ्ती, मुसलमानों के खिलाफ हिंसा सामान्य करने का आरोप

भारतीय राजनीति के गलियारों में एक बार फिर भूचाल आ गया है। जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल पर बेहद गंभीर और तीखे आरोप लगाए हैं।
उनका कहना है कि डोभाल न केवल एक सांप्रदायिक विचारधारा को बढ़ावा दे रहे हैं, बल्कि मुसलमानों के खिलाफ हो रही हिंसा को सामान्य और वैध बनाए जाने की प्रक्रिया का हिस्सा भी हैं।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में धार्मिक ध्रुवीकरण, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर बहस पहले से ही तेज़ है।

🔥 महबूबा मुफ्ती का सीधा हमला — “ये सिर्फ राजनीति नहीं, एक सोच है”

महबूबा मुफ्ती ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर कहा:

“जब देश का राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ही ऐसी भाषा और सोच को बढ़ावा देता है जो नफरत को जायज़ ठहराए, तो यह सिर्फ राजनीति नहीं रहती — यह एक खतरनाक वैचारिक परियोजना बन जाती है।”

उनका इशारा उन बयानों और नीतिगत फैसलों की ओर था, जिनके बारे में उनका दावा है कि वे मुस्लिम समुदाय को ‘आंतरिक दुश्मन’ की तरह पेश करते हैं।

🧩 NSA अजीत डोभाल और ‘सुरक्षा बनाम नागरिक अधिकार’ की बहस

अजीत डोभाल भारत के सबसे ताकतवर और प्रभावशाली अधिकारियों में गिने जाते हैं। उनकी छवि एक सख्त, राष्ट्रवादी और सुरक्षा-केंद्रित रणनीतिकार की रही है।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि:

सुरक्षा के नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं की अनदेखी की जा रही है

कश्मीर, UAPA, CAA-NRC जैसे मुद्दों पर एकतरफा दृष्टिकोण अपनाया गया

मुसलमानों को बार-बार संदेह के घेरे में खड़ा किया गया

महबूबा मुफ्ती के मुताबिक, यह सब किसी दुर्घटना का नतीजा नहीं बल्कि एक सोची-समझी नीति है।

🕌 “मुसलमानों के खिलाफ हिंसा अब अपवाद नहीं रही”

महबूबा मुफ्ती ने कहा कि:

मॉब लिंचिंग

नफरती भाषण

धार्मिक पहचान के आधार पर गिरफ्तारियाँ

बुलडोज़र कार्रवाई

अब “असामान्य” नहीं रही हैं।
उनके शब्दों में, “जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग चुप रहते हैं या परोक्ष समर्थन देते हैं, तो हिंसा को सामाजिक स्वीकृति मिल जाती है।”

⚖️ संविधान बनाम विचारधारा

उन्होंने भारतीय संविधान का हवाला देते हुए कहा कि:

भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है

कानून सभी के लिए समान होना चाहिए

राज्य का काम नागरिकों को बांटना नहीं, जोड़ना है

महबूबा मुफ्ती का आरोप है कि मौजूदा शासन व्यवस्था में संविधान की आत्मा से ज्यादा विचारधारा को तरजीह दी जा रही है।

🗣️ बीजेपी की प्रतिक्रिया और सियासी टकराव

बीजेपी नेताओं ने महबूबा मुफ्ती के आरोपों को:

“राष्ट्र विरोधी बयान”

“ध्यान भटकाने की राजनीति”

“आतंकवाद के प्रति नरमी”

बताकर खारिज कर दिया।

उनका कहना है कि अजीत डोभाल ने देश की सुरक्षा के लिए अभूतपूर्व काम किया है और उन पर इस तरह के आरोप लगाना सशस्त्र बलों का मनोबल गिराने जैसा है।

🌍 अंतरराष्ट्रीय छवि और मानवाधिकार सवाल

महबूबा मुफ्ती ने यह भी कहा कि इन नीतियों का असर सिर्फ देश के भीतर नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि पर भी पड़ रहा है।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट

संयुक्त राष्ट्र में उठते सवाल

विदेशी मीडिया की आलोचनाएं

उनके अनुसार, यह सब भारत की लोकतांत्रिक साख को कमजोर कर रहा है।

Mehbooba slams NSA Doval's avenge remarks as 'dog whistle'
“नफरत की राजनीति को वैचारिक सुरक्षा कवच दिया जा रहा है” — NSA अजीत डोभाल पर भड़कीं महबूबा मुफ्ती, मुसलमानों के खिलाफ हिंसा सामान्य करने का आरोप

🧠 असल मुद्दा क्या है?

यह विवाद सिर्फ अजीत डोभाल बनाम महबूबा मुफ्ती नहीं है।
असल सवाल यह है:

क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर किसी समुदाय को निशाना बनाया जा सकता है?

क्या असहमति को देशद्रोह समझा जाएगा?

क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध बनता जा रहा है?

✍️ निष्कर्ष (Tell it like it is)

सच कड़वा है, लेकिन कहना ज़रूरी है।
अगर सत्ता सवालों से डरने लगे, तो लोकतंत्र बीमार पड़ जाता है।
और अगर नफरत को नीति बना लिया जाए, तो सुरक्षा भी खोखली हो जाती है।

महबूबा मुफ्ती का बयान चाहे आपको पसंद आए या नहीं, लेकिन उसने एक जरूरी बहस को फिर से ज़िंदा कर दिया है —
भारत किस रास्ते पर जा रहा है?

पुरानी तहज़ीब कहती है “राजा वही जो सबका हो”
और नई पीढ़ी बोलेगी — अगर सबका नहीं, तो legit सवाल उठेंगे। 🖤


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