बिहार में दादा की हत्या का नाबालिग पोते ने लिया इंतकाम, त्रिशूल से गोदकर किया हत्या
- byAman Prajapat
- 22 January, 2026
बिहार की धरती, जहां रिश्तों की जड़ें कभी बरगद की तरह मजबूत मानी जाती थीं, आज वहीं खून की बूंदें उन जड़ों को सड़ा हुआ साबित कर रही हैं। ताज़ा मामला दिल दहला देने वाला है। एक नाबालिग, जिसकी उम्र अभी सपनों की होनी चाहिए थी, उसने अपने हाथों में कानून नहीं, बल्कि बदले की आग थाम ली। वजह — दादा की हत्या। तरीका — त्रिशूल। और नतीजा — एक और लाश, एक और परिवार उजड़ा हुआ।
घटना की पृष्ठभूमि
यह सनसनीखेज वारदात बिहार के एक ग्रामीण इलाके में सामने आई। गांव की गलियों में सुबह की चाय अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि खबर आग की तरह फैल गई — “फलां आदमी को त्रिशूल से गोद दिया गया।” लोग दौड़े, पुलिस आई, और जमीन पर बिखरा था खून… बहुत सारा खून।
पुलिस जांच में जो सामने आया, वो और भी चौंकाने वाला था। हत्या किसी पेशेवर अपराधी ने नहीं, बल्कि एक नाबालिग लड़के ने की थी। वही लड़का, जिसके दादा की कुछ समय पहले हत्या हुई थी। उस हत्या का आरोप इसी मृतक पर था या कम से कम परिवार को यही यकीन था।
बदले की आग में झुलसता बचपन
यह कहानी सिर्फ अपराध की नहीं, एक टूटते बचपन की भी है। जब परिवार में किसी अपने की हत्या होती है, तो दर्द सिर्फ बड़ों तक सीमित नहीं रहता। वो दर्द बच्चों के मन में भी घर कर जाता है। इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ।
नाबालिग पोते के मन में दादा की मौत का गुस्सा धीरे-धीरे बदले में बदल गया। घर के बड़े शायद इंसाफ का इंतजार कर रहे थे, लेकिन बच्चे के दिल में कानून से ज्यादा तेज आग जल रही थी। और सच बोलूं? यही वो मोड़ है जहां समाज फेल हो जाता है।
त्रिशूल — आस्था से हिंसा तक
हत्या में इस्तेमाल हुआ हथियार त्रिशूल था। वही त्रिशूल जिसे लोग आस्था, शक्ति और रक्षा का प्रतीक मानते हैं। लेकिन यहां वही त्रिशूल खून से लाल था। सवाल उठता है — क्या हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीक अब बच्चों के हाथों में हिंसा का औजार बनते जा रहे हैं?
ग्रामीण इलाकों में त्रिशूल आसानी से मिल जाता है — मंदिरों में, घरों में, पूजा के सामान के साथ। लेकिन जब आस्था और गुस्सा मिलते हैं, तो नतीजा अक्सर खतरनाक होता है।
वारदात का दिन
पुलिस के अनुसार, नाबालिग ने मौके का इंतजार किया। जैसे ही उसे मृतक अकेला मिला, उसने हमला कर दिया। वार इतने बेरहमी से किए गए कि बचने का कोई मौका नहीं मिला। चीख-पुकार हुई, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
ग्रामीणों का कहना है कि हमला अचानक था। किसी को अंदाजा तक नहीं था कि एक बच्चा ऐसा कदम उठा सकता है। यही तो सबसे डरावनी बात है।
पुलिस की कार्रवाई
घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची। शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। नाबालिग को हिरासत में लिया गया और किशोर न्याय अधिनियम के तहत कार्रवाई शुरू की गई।
पुलिस अधिकारी साफ कहते हैं — “कानून अपना काम करेगा। आरोपी नाबालिग है, इसलिए उसे सुधार गृह भेजा जाएगा।”
लेकिन सवाल ये है कि क्या सिर्फ सुधार गृह से ऐसे घाव भर जाएंगे?
परिवारों का दर्द
एक तरफ मृतक का परिवार, जो अब अपने आदमी को खो चुका है। दूसरी तरफ नाबालिग का परिवार, जिसने पहले दादा खोया और अब बेटा सुधार गृह में है। दो परिवार, दो लाशें (एक जिंदा होकर भी खोई हुई), और बीच में समाज की चुप्पी।
गांव में मातम पसरा है। लोग फुसफुसा रहे हैं, बहस कर रहे हैं, लेकिन किसी के पास ठोस जवाब नहीं है।
कानून बनाम भावना
कानून कहता है — बदला लेना अपराध है।
भावना कहती है — अपनों के लिए इंसाफ चाहिए।
यहीं से टकराव शुरू होता है। जब इंसाफ देर से मिलता है, या मिलता ही नहीं, तब लोग खुद न्यायाधीश बन जाते हैं। और जब ये काम बच्चे करने लगें, तो समझ लीजिए सिस्टम कहीं न कहीं चूक गया है।

समाज के लिए आईना
यह घटना सिर्फ एक क्राइम न्यूज नहीं है। यह आईना है — हमारे समाज के लिए, हमारे सिस्टम के लिए, हमारे परिवारों के लिए।
हम बच्चों को क्या सिखा रहे हैं?
क्या हम उन्हें धैर्य सिखा रहे हैं या नफरत?
क्या हम उन्हें कानून पर भरोसा करना सिखा रहे हैं या बदला लेना?
आज का सच कड़वा है, लेकिन सच यही है — अगर दर्द, गुस्सा और बदले को समय रहते संभाला नहीं गया, तो अगली खबर और भी डरावनी होगी।
आखिर में, साफ-साफ बात
नो फिल्टर बोलूं तो ये मामला शर्मनाक है। रिश्ते खून में डूब रहे हैं, बचपन जेल की चारदीवारी में जा रहा है, और हम बस खबर पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं।
परंपराएं कहती हैं — बड़ों का सम्मान, धैर्य और संयम।
आज की हकीकत कहती है — गुस्सा, हिंसा और जल्द इंसाफ।
अगर अब भी नहीं चेते, तो “दादा की हत्या का बदला” जैसी सुर्खियां आम हो जाएंगी। और तब दोष किसी एक बच्चे का नहीं, हम सबका होगा।
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राजस्थान में अपराधों...
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