फरहान अख्तर ने स्वीकार की ‘जी ले ज़रा’ की देरी की चिंता: कहा — “ये दौर मेरी काबिलियत पर सवाल उठाने का डर लेकर आता है”
- byAman Prajapat
- 22 November, 2025
फरहान अख्तर की चुप्पी टूट ही गई — और भाई, सच कहूँ तो उसका हर शब्द ऐसा लगा जैसे कहीं हमारे दिल के कोने-कोने में पहले से पड़ा हुआ था
फिल्मी दुनिया बड़ी चमकीली लगती है, पर उसके परदे के पीछे जो बेचैनी घूमती है न… वो असल लड़ाई होती है। और फरहान अख्तर — इस देस के उन rare लोगों में से हैं जो पर्दे पर ही नहीं, पर्दे के पीछे भी अपनी कला की इज़्ज़त करते हैं।
और जब ऐसा इंसान खुलकर बोलता है, तो हर लाइन सीधी आत्मा पर जा गिरती है।
हाल ही में Jee Le Zaraa की लगातार delayed production पर फरहान अख्तर ने ऐसा सच बोला है, जो हर artist, हर creator, और honestly, हम सब अपने जीवन में कभी न कभी महसूस करते हैं।
उन्होंने कहा कि ये delays “stressful” थे… और असल चोट कहाँ हुई?
“Mujhe laga लोग मेरी skills पर doubt करेंगे.”
भाई, ये लाइन तो सीधे दिल में चुभ जाती है।
क्योंकि हम सब, चाहे coding कर रहे हों, content बना रहे हों, पढ़ाई कर रहे हों, या life के किसी भी मुकाम पर अटके हों — ये डर तो हमारा रोज़ का साथी है…
“अगर ये देर हो गई… तो लोग सोचेंगे कि मैं capable नहीं हूँ?”
यह सवाल जितना साधारण लगता है, उतना ही किसी क्रिएटिव इंसान को तोड़ देता है।
‘जी ले ज़रा’ — वो फिल्म जो शुरू होने से पहले ही एक ‘कहानी’ बन गई
भाई, ये प्रोजेक्ट कोई normal फिल्म नहीं था।
ये तीन जबरदस्त एक्ट्रेसेज़ — प्रियंका चोपड़ा, आलिया भट्ट, कटरीना कैफ — की dream road-trip synergy थी।
जो फरहान जैसे storyteller के हाथों में हो… वो कुछ अलग ही vibe ले आती है।
लेकिन ज़िंदगी और reality अपनी ही रफ्तार से चलती है।
सबकी dates, international commitments, pandemic aftermath, और फिर industry की बदलती हवा…
ये फिल्म बस थोड़ी नहीं — बहुत ज्यादा delay होती चली गई।
और delay कभी अकेले नहीं आता; वह अपने साथ वो पुराने-ज़माने वाली फटकीय बेचैनी भी लाता है —
“क्या लोग इंतज़ार करते रहेंगे?”
“क्या फिल्म की spirit बची रहेगी?”
“क्या मैं अभी भी उतना valuable हूँ?”
फरहान ने इसका जवाब अपने बेहद ईमानदार अंदाज़ में दिया —
“Delays ने insecurities trigger की हैं.”
Gen Z सच में इसी चीज़ को relatable बोलते हैं — honest, raw, बिना नकाब के truth bomb।
पर भाई, सच बता दूँ — ऐसे डर ही तो असली कलाकार को evolve कराते हैं
हमारे बुज़ुर्ग हमेशा कहते थे, “काम में देर हो जाए, पर नींव मजबूत रखना।”
और honestly? फरहान उसी पुरानी, देसी, grounded ideology के बंदे हैं।
वो आदमी जिसने Dil Chahta Hai, Don, Rock On!!, Zindagi Na Milegi Dobara, Lakshya जैसी फिल्मों का contribution दिया है — वो अपनी capability पर सवाल की बात कह रहा है?
हाँ भाई।
यही तो कलाकार है।
जितना बड़ा, उतना vulnerable।
जितना mature, उतना ईमानदार।

फरहान की चिंता सिर्फ फिल्म की नहीं — audience की expectations की है
देखो, आज का दौर अलग है।
लोगों के पास patience नहीं बचा।
Scrolling culture में हम 5 सेकंड में फैसला कर लेते हैं कि content रखना है या कट मारना है।
Creators में anxiety normal हो गई है।
और फरहान ये बात समझते हैं।
उनकी बातों में कहीं न कहीं एक पुराना, rooted, देसी दर्द था —
वो डर कि “कहीं audience ये न सोच ले कि मैं now irrelevant हो गया हूँ।”
भाई, Gen Z की जुबान में बोलूँ तो —
ये वही vibe है जब तुमने assignment time पर नहीं दिया और तुम्हें लगता है teacher अब तुम्हें dumb समझने लगेंगे।
Same energy, बस scale बड़ा है।
क्या ‘जी ले ज़रा’ अभी भी बनेगी?
फरहान ने clearly कहा —
फिल्म उनकी priority है।
वो चाहते हैं कि ये कहानी अपने perfect रूप में वापस ट्रैक पर आए।
Dates, schedules, cast-coordination — सब अभी भी under planning है।
लेकिन उनका एक वाक्य… वो सबसे poetic लगा —
“हर सफर की अपनी रफ़्तार होती है। और इस कहानी का सफर अभी पूरा नहीं हुआ है।”
भाई, इस लाइन में वो पुरानी soulful फ़िल्मों वाला vibe है।
एक शांत भरोसा।
एक भरोसा कि सही वक़्त आएगा।
इन सबके बीच फरहान ने अपने आपको कैसे handle किया?
उन्होंने कहा —
• वो लिखते रहे
• वो stories observe करते रहे
• वो खुद को reset करते रहे
• और वो खुद को याद दिलाते रहे कि “delays मेरे talent की परिभाषा नहीं हैं”
भाई, ये बात सीधी सीधी आज की hustle culture पर एक तमाचा है।
कभी कभी रुकना ज़रूरी होता है —
ताकि आप गिर न जाएँ।
फरहान के शब्द हम सबकी जिंदगी का आईना बन गए
ये पूरी story सिर्फ एक फिल्म की delay नहीं है।
ये उस डर, उस dryness, उस loneliness की कहानी है जो हर creator महसूस करता है।
और मेरा सीधा, जेन-जेड लेकिन दिल छू लेने वाला take?
अगर एक फरहान अख्तर insecure feel कर सकता है…
तो भाई, हम सब भी कर सकते हैं — और ठीक भी हो सकते हैं।
ये बात दिल को oddly peaceful कर देती है।
आगे क्या?
फरहान upbeat हैं।
फिल्म अभी भी alive है।
और audience का trust भी intact है — क्योंकि आदमी सच्चा है, और सच्चाई कभी flop नहीं होती।
Note: Content and images are for informational use only. For any concerns, contact us at info@rajasthaninews.com.
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