बजट सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक: सभी दलों के सुझावों के लिए खुला है केंद्र — किरेन रिजिजू
- byAman Prajapat
- 27 January, 2026
भारतीय लोकतंत्र की आत्मा संसद में बसती है, और संसद की सेहत इस बात पर निर्भर करती है कि सत्ता और विपक्ष कितनी ईमानदारी से संवाद करते हैं। बजट सत्र से ठीक पहले आयोजित सर्वदलीय बैठक इसी संवाद की एक अहम कड़ी मानी जाती है। इसी कड़ी में केंद्र सरकार द्वारा बुलाई गई बैठक के बाद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू का बयान राजनीतिक हलकों में चर्चा का केंद्र बन गया है।
किरन रिजिजू ने साफ शब्दों में कहा कि केंद्र सरकार सभी राजनीतिक दलों के सुझावों के लिए पूरी तरह खुली है और चाहती है कि आने वाला बजट सत्र सुचारू रूप से चले। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब संसद के पिछले सत्रों में बार-बार व्यवधान, हंगामा और वॉकआउट देखने को मिले हैं।
सर्वदलीय बैठक का उद्देश्य
बजट सत्र संसद का सबसे महत्वपूर्ण सत्र माना जाता है। इसी सत्र में देश की आर्थिक दिशा तय होती है — टैक्स, सब्सिडी, योजनाएँ, रक्षा खर्च, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अहम मुद्दों पर सरकार की प्राथमिकताएँ सामने आती हैं। ऐसे में सरकार चाहती है कि यह सत्र बिना बाधा के चले।
सर्वदलीय बैठक का मुख्य उद्देश्य यही था कि:
विपक्षी दल अपनी चिंताएँ खुलकर रखें
सरकार उन मुद्दों को पहले से समझे
सत्र के दौरान टकराव की बजाय चर्चा हो
किरेन रिजिजू का बयान
बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में किरेन रिजिजू ने कहा:
“हम चाहते हैं कि संसद चले। लोकतंत्र में चर्चा जरूरी है। सरकार सभी दलों के सुझाव सुनने के लिए तैयार है।”
यह बयान दिखाता है कि सरकार इस बार टकराव नहीं, बल्कि सहयोग की राह अपनाना चाहती है। रिजिजू ने यह भी संकेत दिया कि विपक्ष जिन मुद्दों को उठाना चाहता है, उन्हें नियमों के तहत चर्चा में शामिल किया जा सकता है।
विपक्ष की भूमिका और चिंताएँ
सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके, आप और अन्य दलों के प्रतिनिधि शामिल हुए। विपक्ष ने कथित तौर पर इन मुद्दों को उठाया:
महंगाई और बेरोज़गारी
किसानों की स्थिति
संघीय ढांचे से जुड़े सवाल
जांच एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप
संसद में चर्चा के लिए पर्याप्त समय की मांग
विपक्ष का कहना रहा है कि सरकार कई अहम मुद्दों पर चर्चा से बचती है, जिससे सदन में हंगामे की स्थिति बनती है।
सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार की ओर से यह संदेश देने की कोशिश की गई कि:
चर्चा से कोई परहेज नहीं है
लेकिन संसद की गरिमा बनी रहनी चाहिए
हंगामा समाधान नहीं है
किरेन रिजिजू ने यह भी कहा कि संसद देश की जनता की आवाज़ है और इसे बाधित करना किसी के हित में नहीं है।
बजट सत्र का राजनीतिक महत्व
2026 का बजट सत्र सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद अहम है। आने वाले समय में कई राज्यों में चुनाव होने हैं और 2029 के आम चुनाव की तैयारी भी यहीं से शुरू मानी जाती है। ऐसे में:
सरकार अपनी आर्थिक नीतियों को मजबूती से रखना चाहती है
विपक्ष सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहता

संसद और लोकतंत्र
भारतीय संसद केवल कानून बनाने की जगह नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक है। जब संसद ठप होती है, तो इसका सीधा असर जनता के विश्वास पर पड़ता है। सर्वदलीय बैठकें इसीलिए ज़रूरी होती हैं ताकि:
संवाद बना रहे
मतभेद सुलझाए जा सकें
लोकतंत्र मजबूत हो
क्या इस बार बदलेगा माहौल?
यह बड़ा सवाल है। बयान अच्छे हैं, इरादे सही दिखते हैं, लेकिन असली परीक्षा बजट सत्र के दौरान होगी। क्या:
सरकार विपक्ष की बात सुनेगी?
विपक्ष चर्चा को प्राथमिकता देगा?
संसद में कामकाज सुचारू रहेगा?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे।
🔚 निष्कर्ष
किरेन रिजिजू का यह बयान कि “केंद्र सभी दलों के सुझावों के लिए खुला है” एक सकारात्मक संकेत जरूर है। लेकिन भारतीय राजनीति में शब्दों से ज़्यादा अहम कर्म होते हैं। अगर बजट सत्र बिना बड़े व्यवधान के चलता है, तो यह लोकतंत्र की जीत होगी — वरना यह बयान भी बाकी राजनीतिक बयानों की तरह इतिहास के पन्नों में खो जाएगा।
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