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एशियाई देशों को अब तेज करनी होगी ग्रीन एनर्जी की रफ्तार! भारत समेत देशों से सौर-पवन ऊर्जा अपनाने की अपील, ऊर्जा सुरक्षा पर जोर

एशियाई देशों को अब तेज करनी होगी ग्रीन एनर्जी की रफ्तार! भारत समेत देशों से सौर-पवन ऊर्जा अपनाने की अपील, ऊर्जा सुरक्षा पर जोर

एशिया में ग्रीन एनर्जी की रफ्तार बढ़ाने पर जोर, ऊर्जा संकट के बीच सौर-पवन ऊर्जा की ओर मुड़ रहे देश

एशियाई देशों के सामने ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती

नई दिल्ली। एशियाई देशों में नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव तेज करने की जरूरत एक बार फिर चर्चा में है। सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसे स्वच्छ विकल्पों का विस्तार अब केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह ऊर्जा सुरक्षा, ईंधन की उपलब्धता और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाल के ऊर्जा आपूर्ति जोखिमों ने एशियाई देशों को अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने और घरेलू स्तर पर स्वच्छ बिजली उत्पादन बढ़ाने की जरूरत पर ध्यान देने के लिए प्रेरित किया है।

रॉयटर्स की 8 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान युद्ध से जुड़े ऊर्जा आपूर्ति जोखिमों के बीच एशियाई देश तेल भंडारण क्षमता बढ़ाने, क्षेत्रीय बिजली ग्रिड विकसित करने और नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल को तेज करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों ने स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने के लक्ष्य भी दोहराए हैं। <Cite refs={["turn854623view1","turn357153news25"]}/>

तेल और गैस पर निर्भरता घटाना क्यों जरूरी?

कई एशियाई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयातित तेल और गैस पर निर्भर हैं। अंतरराष्ट्रीय संघर्ष, समुद्री मार्गों में व्यवधान या वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ने से इन देशों की ऊर्जा लागत प्रभावित हो सकती है। इसका असर परिवहन, उद्योग, बिजली उत्पादन और आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान युद्ध से पहले होर्मुज जलडमरूमध्य से खाड़ी क्षेत्र का जो तेल गुजरता था, उसका लगभग 80 प्रतिशत दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर जाता था। इस निर्भरता के कारण क्षेत्र में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर जोखिम बढ़ा है। ऐसे हालात में तेल भंडार बढ़ाने के साथ-साथ ऊर्जा के दूसरे स्रोतों को विकसित करना भी देशों की रणनीति का हिस्सा बन रहा है। <Cite refs={["turn854623view1"]}/>

नवीकरणीय ऊर्जा इस दिशा में मदद कर सकती है। सौर और पवन ऊर्जा का घरेलू उत्पादन बढ़ने से बिजली बनाने के लिए आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करने का अवसर मिलता है। हालांकि, इससे तेल और गैस की जरूरत तुरंत पूरी तरह समाप्त नहीं होती, क्योंकि परिवहन, उद्योग और बिजली व्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में ऊर्जा की जरूरतें अलग होती हैं।

सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा पर क्यों है ध्यान?

सौर ऊर्जा सूर्य की रोशनी से बिजली पैदा करती है, जबकि पवन ऊर्जा में हवा की गति का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के लिए किया जाता है। इन स्रोतों से बिजली बनाने के दौरान कोयला और प्राकृतिक गैस जैसे ईंधन जलाने की जरूरत कम हो सकती है। इससे ऊर्जा क्षेत्र के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को घटाने में मदद मिल सकती है।

एशिया में इन स्रोतों के विस्तार की संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन हर देश की परिस्थितियां अलग हैं। कहीं सौर ऊर्जा के लिए पर्याप्त धूप उपलब्ध है, तो कहीं पवन ऊर्जा की परियोजनाओं के लिए उपयुक्त क्षेत्र मिल सकते हैं। परियोजनाओं की सफलता के लिए जमीन, निवेश, तकनीक, बिजली ग्रिड और स्थानीय पर्यावरण का ध्यान रखना भी जरूरी है।

इसके अलावा, सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन मौसम और प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए इनके विस्तार के साथ बिजली को संग्रहित करने की तकनीक, बेहतर ग्रिड और जरूरत के अनुसार बिजली उपलब्ध कराने की व्यवस्था विकसित करनी होगी। ऊर्जा बदलाव की गति इस बात पर भी निर्भर करेगी कि देश इन चुनौतियों का समाधान कितनी प्रभावी तरीके से करते हैं।

दक्षिण-पूर्व एशिया ने तय किए स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े लक्ष्य

रॉयटर्स की रिपोर्ट में नौ दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के एक संयुक्त बयान का उल्लेख है, जिसमें जापान और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल थे। रिपोर्ट के मुताबिक, आसियान देशों ने अपनी कुल प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत और स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता में इसकी हिस्सेदारी 45 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।

रिपोर्ट में उद्धृत नौवें आसियान ऊर्जा आउटलुक के अनुसार, क्षेत्र की कुल प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी 14.1 प्रतिशत बताई गई, जबकि स्थापित बिजली क्षमता में स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी 33.7 प्रतिशत थी। ये आंकड़े दिखाते हैं कि लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अभी और प्रगति की जरूरत है। <Cite refs={["turn854623view1"]}/>

इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए नई परियोजनाओं में निवेश, बिजली ग्रिड का आधुनिकीकरण और देशों के बीच ऊर्जा सहयोग अहम हो सकता है। स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने के साथ बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखना भी जरूरी रहेगा।

क्षेत्रीय बिजली ग्रिड से क्या फायदा हो सकता है?

एशियाई देशों में ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए क्षेत्रीय बिजली ग्रिड को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि अलग-अलग देशों के बिजली नेटवर्क को प्रभावी तरीके से जोड़ा जाता है, तो जरूरत पड़ने पर एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में बिजली पहुंचाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

रॉयटर्स के मुताबिक, आसियान देशों ने लंबे समय से प्रस्तावित क्षेत्रीय बिजली नेटवर्क को आगे बढ़ाने के लिए प्रारंभिक समझौते को मजबूत किया है। फिलीपींस की ऊर्जा सचिव शेरोन गारिन ने कहा कि इस परियोजना को पहले की तुलना में तेजी से लागू करने के विकल्पों की समीक्षा की जा रही है। <Cite refs={["turn854623view1"]}/>

ऐसी व्यवस्था स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल को भी समर्थन दे सकती है। अलग-अलग क्षेत्रों में बिजली उत्पादन और मांग का समय अलग होने पर बेहतर कनेक्टिविटी से उपलब्ध संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग संभव हो सकता है। हालांकि, इसके लिए देशों के बीच तकनीकी मानकों, निवेश, बिजली व्यापार और नियामकीय व्यवस्था पर सहमति आवश्यक होगी।

भारत के लिए क्या मायने हैं?

भारत के लिए नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार बिजली की बढ़ती मांग और ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने से जुड़ा हुआ है। देश में सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार के साथ यह भी जरूरी है कि उत्पादित बिजली को भरोसेमंद तरीके से ग्रिड तक पहुंचाया जाए और जरूरत के समय उसका उपयोग किया जा सके।

ऊर्जा भंडारण, ट्रांसमिशन नेटवर्क का विकास और बिजली वितरण व्यवस्था में सुधार इस बदलाव के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। यदि स्वच्छ बिजली का उत्पादन बढ़ता है, तो कुछ क्षेत्रों में जीवाश्म ईंधन से बनने वाली बिजली पर निर्भरता कम करने का अवसर मिल सकता है। इसके साथ ही उद्योगों और परिवहन में बिजली के इस्तेमाल को बढ़ाने की योजनाएं भी ऊर्जा बदलाव में भूमिका निभा सकती हैं।

हालांकि, एशिया के सभी देशों के लिए एक ही मॉडल प्रभावी नहीं हो सकता। भारत की ऊर्जा मांग, भौगोलिक परिस्थितियां और बिजली व्यवस्था दक्षिण-पूर्व एशिया के छोटे देशों से अलग हैं। इसलिए क्षेत्रीय अनुभवों से सीखने के साथ घरेलू जरूरतों के अनुरूप नीतियां बनाना जरूरी है।

ऊर्जा बदलाव में कौन-सी चुनौतियां आएंगी?

नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार कई अवसर पैदा करता है, लेकिन इसके साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। सौर और पवन परियोजनाओं के लिए निवेश, उपयुक्त जमीन, आधुनिक तकनीक और मजबूत बिजली नेटवर्क की आवश्यकता होती है। उत्पादन में उतार-चढ़ाव होने के कारण ऊर्जा भंडारण और बिजली आपूर्ति का बेहतर प्रबंधन भी महत्वपूर्ण है।

इसके अलावा, परियोजनाओं की लागत और बिजली की अंतिम कीमत पर भी ध्यान देना होगा। ऊर्जा बदलाव ऐसा होना चाहिए जिसमें आम उपभोक्ताओं को भरोसेमंद बिजली मिले और उद्योगों की जरूरतें भी पूरी हों। जिन क्षेत्रों में पारंपरिक ऊर्जा उद्योगों पर बड़ी संख्या में लोग निर्भर हैं, वहां बदलाव के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को भी ध्यान में रखना होगा।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वित्तीय सहायता इस प्रक्रिया को आसान बना सकते हैं। तकनीकी अनुभव साझा करने, निवेश बढ़ाने और बिजली नेटवर्क को आधुनिक बनाने से देशों को अपनी ऊर्जा योजनाओं को लागू करने में मदद मिल सकती है।

पर्यावरण संरक्षण के साथ ऊर्जा सुरक्षा पर भी जोर

नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव का एक प्रमुख उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना है। जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल में कमी से जलवायु परिवर्तन को सीमित करने के प्रयासों को समर्थन मिल सकता है। साथ ही, घरेलू स्तर पर सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन बढ़ने से कुछ देशों को अंतरराष्ट्रीय ईंधन आपूर्ति में होने वाले व्यवधानों के जोखिम कम करने का अवसर मिल सकता है।

फिर भी, स्वच्छ ऊर्जा की सफलता केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाने से तय नहीं होगी। परियोजनाओं का पर्यावरणीय प्रभाव, जमीन का इस्तेमाल, बिजली नेटवर्क की क्षमता और ऊर्जा की किफायती उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए नीतिगत योजना में पर्यावरण और आर्थिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक रहेगा।

निष्कर्ष

एशियाई देशों में नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज बदलाव की जरूरत इसलिए बढ़ रही है क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण अब एक-दूसरे से जुड़े हुए मुद्दे बन चुके हैं। सौर और पवन ऊर्जा का विस्तार, ऊर्जा स्रोतों में विविधता, बेहतर बिजली ग्रिड और क्षेत्रीय सहयोग इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

हालिया ऊर्जा आपूर्ति जोखिमों ने इस चर्चा को और प्रासंगिक बना दिया है। अब चुनौती यह होगी कि देश घोषित लक्ष्यों को प्रभावी नीतियों, निवेश और परियोजनाओं के जरिए वास्तविक प्रगति में बदलें।


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